Thursday, 1 April 2010

जीवन की छोटी मामूली बातें

ये प्‍यार जताना, पकड़ना किसी का हाथ, कहना I love you, ये क्‍यों इतना जरूरी है? जो न कहो तो कुछ फर्क पड़ता है क्‍या? जो मैं ये न कहूं किसी से या कि कोई मुझसे तो क्‍या बिगड़ता है? कितनी मामूली बातें? जीवन की ये बहुत छोटी, मामूली बातें, इनसे सचमुच कुछ बदलता है क्‍या? पता नहीं। लेकिन शायद ये बेहद मामूली सी दिखने वाली बातें ही कई बार बहुत मुश्किल ऊबड़-खाबड़ सी जिंदगी को जीने लायक बनाती हैं।

ऐसी जाने कितनी छोटी, मामूली बातें हैं, जो मुझे बार-बार जिंदगी की ओर लौटा लाती हैं। दुख और थकन के सबसे अंधेरे दिनों में आकर मेरा हाथ थाम लेती हैं। मेरे उलझे बाल सुलझाती हैं, गालों को छूती हैं। मेरे तकिए पर सो जाती हैं। मेरे बगल में लेटकर एक पैर मेरे ऊपर रख लगभग जकड़ सी लेती हैं। ऐसे कि मैं हिल भी न सकूं और कहती हैं, चुप, अब लात खाएगी, ज्‍यादा भैं-भैं किया तो। मेरी हथेली को अपनी हथेलियों में थामे देर तक बस यूं ही बैठी रहती हैं। कुछ कहती नहीं, बस बता देती हैं कि मैं हूं।

बेहद छोटी, मामूली बातें।

सोचो तो कितना मुश्किल है ये जीवन। हम सब अपने भीतर उदास बदरंग रौशनियों का एक शहर लिए फिरते हैं। बेमतलब भटकता है मन उस शहर की अंधेरी, संकरी गलियों में। पूरी रात भटकता है, बिना ये जाने कि जाना कहां है। मैं भी अपने भीतर के उस बदरंग रौशनियों वाले शहर में बेमतलब, उदास भटका करती थी। मुंबई के वे दिन जिंदगी के सबसे अकेले दिन थे। हालांकि समूची जिंदगी के बहुत सारे दिन अकेले दिन ही होते हैं। लेकिन वो अकेलापन इतनी भारी थी कि उसका बोझ मैं अकेले नहीं उठा सकती थी। वो छोटी, मामूली बातें ही अपना हाथ आगे बढ़ातीं और बोझ बांट लेतीं।

चर्नी रोड में ऑफिस से बाहर निकलते ही सड़क पार करके समंदर था। दो बस स्‍टॉप ऑफिस से समान दूरी पर थे। एक हॉस्‍टल की तरफ और दूसरा समंदर की तरफ। मैं बस का इंतजार करने हमेशा समंदर की तरफ वाले बस स्‍टॉप पर जाती। वो स्‍टॉप बहुत प्‍यारा लगता था, सिर्फ इसलिए क्‍योंकि वहां से समंदर को देखा जा सकता था। वहां खड़े होकर घंटों इंतजार करना भी नहीं खलता। ऑफिस बहुत उदास सा था और जीवन बेहद अकेला। बस का इंतजार करते हुए सिर्फ कुछ क्षण समंदर का साथ मेरे चेहरे पर एक मुस्‍कान ला सकता था।

भारतीय विद्या भवन में ही नीचे सितार की क्‍लासेज होती थीं। दफ्तर में बैठी दोपहरी बहुत बोझिल होती। लगता था कहीं भाग जाऊं। बस कहीं भी निकल जाऊं। दिन भर फोन की घंटी का इंतजार होता। किसी की आवाज का, एक मेल का। दफ्तर में आने वाली डाक का। घंटी नहीं बजती थी क्‍योंकि उसे बजना नहीं होता था। चिट्ठी नहीं आती, क्‍योंकि उसे आना नहीं होता था। शाम तक उदासी दोहरी हो जाती। मैं हॉस्‍टल लौटने के बजाय सेकेंड फ्लोर पर सितार की क्‍लास में जाकर बैठ जाती। घंटों चुपचाप बैठी रहती। वहां कई लड़के-लड़कियां एक साथ रियाज कर रहे होते थे। सितार के तारों पर दौड़ती-फिसलती उंगलियों से ऐसे सुर उठते, हवाओं में ऐसा रंग बहता कि उदासी के सब धुंधलके उसमें धुल जाते। लगता कि सितार के तारों से बहकर कोई नदी मेरी ओर चली आती थी। उसका एक-एक सुर मेरी उंगलियां थामकर कहता था, क्‍यों हो इतनी उदास। देखो न, दुनिया कितनी सुंदर है।

ऑफिस से लौटते हुए बस की खिड़की पर टिकी हुई उदास आंखों में कोई भी मामूली सी चीज एकाएक चमक पैदा कर सकती थी। मोहम्‍मद अली रोड से बस गुजरती तो शाम को एक मस्जिद के खुले मैदान में अजान की नमाज पढ़ी जा रही होती। सैकड़ों सिर एक साथ झुकते और उठते। वो दृश्‍य देखकर मेरा झुका हुआ सिर एकाएक उठ जाता था। जब तक बस गुजर न जाती, मैं वह दृश्‍य देखती रहती। बड़ी मामूली सी बात थी, पर पता नहीं क्‍यों सुंदर लगती थी। रास्‍ते में कोई 6-7 बरस की बच्‍ची ढा़ई मीटर का लंबा दुपट्टा ऐसे नजाकत से संभालने की कोशिश करती, मानो कह रही हो, मैं बड़ी लड़की हूं। मुझे बच्‍ची मत समझना। उसके पीछे-पीछे एक कुत्‍ता दुम दबाए चला जाता। वो छोटी बच्‍ची भी मेरी आंखों में रोशनी ला सकती थी।

बस में कोई 16-17 बरस की चहकती हुई सी लड़की चढ़ती। खुशी और उमंग से भरी, किसी परी‍कथा कि फिरनी जैसी, मोबाइल पर बेसिर-पैर की बातें करती। उसे देखकर मैं खुश हो जाती थी। कोई प्रेमी जोड़ा, जो बस में बैठे सहयात्रियों की तनिक भी परवाह किए बगैर अपनी बेख्‍याली में गुम होता, मेरे भीतर उम्‍मीद जगाता था। दुनिया सचमुच सुंदर है।

हॉस्‍टल लौटती तो मेरे कमरे के नीचे सीढि़यों पर जानू मेरा इंतजार करती मिलती। जानू एक नन्‍ही सी बिल्‍ली थी। उसका ये नाम मैंने ही रखा था। कमरे का ताला खोलने से पहले उसे गोदी में लेकर प्‍यार करना होता था, वरना वो नाराज हो जाती। मेरी गोदी में बैठकर मेरे कुर्ते को दांत से पकड़ती, हथेलियां चाटती, मैं फ्रेश होने बाथरूम में जाती तो पीछे-पीछे चली आती। जब तक बाहर न निकलूं, दरवाजे पर ही बैठी रहती। इतनी शिद्दत से कोई मेरा इंतजार नहीं करता था। इस इतने बड़े शहर में, जहां हर जगह लोग किसी न किसी का इंतजार करते दिखते थे, मेरा इंतजार कोई नहीं करता था, जानू के अलावा। उससे दोस्‍ती होने के बाद मुझे हॉस्‍टल लौटने की जल्‍दी रहने लगी थी। वहां कोई था, जिसे मेरा इंतजार था।

हॉस्‍टल की बालकनी में आम के पेड़ का घना झुरमुट था। बालकनी की रेलिंग पर अक्‍सर एक गिलहरी आती-जाती। किसी अकेली सुबह को वो पेड़ और वो गिलहरी मुझे अपने होने के एहसास से भर सकते थे।

वो शहर बहुत चमकीला था, लेकिन उसकी हर चमक से लोगों के दिलों के अंधेरे और गाढ़े हो जाते थे। एक अजीब सी आइरनी है। मैं मुंबई से अथाह प्रेम और उससे भी ज्‍यादा घृणा एक साथ करती रही हूं। रात के समय Marine Drive पर बैठी होती तो एक ओर अछोर समंदर और उस पर उतरती घनी रात होती तो दूरी ओर आलीशान पांच सितारा होटलों और इमारतों से बह-बहकर आती रौशनी। मैं रौशनी की ओर पीठ करके समंदर पर उतरते अंधेरे को देखती। वो अंधेरा उम्‍मीद जगाता था। मैं समंदर ही लहरों से कहती, दूर क्षितिज पर टंके सितारों से कहती, समंदर में कहीं चले जा रहे जहाज से कहती और दरअसल अपने आप से कहती, इन रंगीनियों के फेर में मत पड़ना। तुम हो तो सब सुंदर है, ये जहां सुंदर है। घंटों इस तरह अपने आप से बातें करने के बाद जब मैं हॉस्‍टल वापस लौटती तो एक नई पहाड़ी नदी मेरे भीतर बह रही होती थी। मैं शब्‍दों की छोटी-छोटी नाव उस नदी में तैराती, हॉस्‍टल लौटकर कविताएं लिखती।

हॉस्‍टल के कमरे में भी ऐसी कई छोटी, मामूली चीजें थीं, जो बुझते हुए मन को दुनिया की हवाओं से आड़ देती थीं। किसी दोस्‍त का इलाहाबाद से आया कोई खत, पद्मा दीदी का भेजा बर्थडे कार्ड, मेरी डायरी के वो पन्‍ने, जो मैंने चहक वाले दिनों में लिखे थे, नेरूदा की प्रेम कविताएं (न मेरी जिंदगी में प्रेम था और न नेरुदा ने वो कविताएं मेरे लिए लिखी थीं, फिर भी उन्‍हें पढ़ना प्रेम की उम्‍मीद जगाता था), एक पुरानी टेलीफोन डायरी, जिसमें इलाहाबाद के वे पुराने नंबर और पते थे, जो अब बदल चुके थे, जिन पर भेजा कोई खत अब अपने ठिकाने तक नहीं पहुंच सकता था, पुरानी चिट्ठियां जो मैंने लिखीं और जो मुझे लिखी गईं। अजीब शौक है। जब भी मैं उदास होती हूं तो वो पुरानी चिट्ठियां पढ़ती हूं। यकीन नहीं होता, मेरी ही जिंदगी के चित्र हैं। ये पंक्तियां मुझे ही लिखी गई थीं क्‍या ? पुराने फोटो एलबम। मां-पापा के बचपन की तस्‍वीरें। मेरे बचपन की तस्‍वीरें। एक पुराना बेढ़ब कटिंग और तुरपाई वाला कुर्ता, जो मैने अपने हाथों से सिला था। जर्मेन ग्रियर की वो किताब, जो मैंने बीए फर्स्‍ट इयर में ट्यूशन की अपनी पहली कमाई से खरीदी थी।

एक पेन और भूरी जिल्‍द वाली वो डायरी, जो मैं उसके घर से उठा लाई थी और क्‍योंकि उसे छूकर मुझे लगता कि वो है मेरे पास। ये सिर्फ दिल के बहलाने का एक ख्‍याल था, जबकि जानती तो मैं भी थी कि दूर-दूर तक कहीं नहीं था वो। वो तमाम लोग, जो जा चुके थे, लेकिन उनसे जुड़ी कुछ चीजें बची रह गई थीं। बेहद छोटी, मामूली चीजें, लेकिन उन्‍हीं मामूली चीजों से मिलकर मैं बनती थी, मेरा जीवन बनता था।

ये छोटी, मामूली चीजें हमेशा कहतीं, ना जीवन अब भी संभावना है, प्रेम अब भी संभावना है और हमेशा रहेगी। दुख और टूटन के सबसे बीहड़ दिनों में भी हम सब तुम्‍हारे कमरे में ऐसे ही रहेंगे तुम्‍हारे साथ।

प्रेम की उम्‍मीद र‍हेगी तुम्‍हारे साथ।

जारी........



31 comments:

dimple said...

अभी इन तमाम चीजों के साथ मैं भी यही कहूंगी के ‘प्रेम की उम्‍मीद र‍हेगी तुम्‍हारे साथ।’

वन्दना अवस्थी दुबे said...

असल में उदासी तो एक भाव है, जो अकेलेपन की देन है. लोगों का साथ हमें बहुत देर तक उदास नहीं रहने देता. अकेलेपन की चाह कभी-कभी कितना दंश दे जाती है. नहीं?

sangeeta swarup said...

जिंदगी के कितने ही लम्हों को इस संस्मरण में समेटा है....हर बात जैसे दिल से निकली हो...पढना बहुत अच्छा लगा.

अविनाश वाचस्पति said...

बातें छोटी छोटी हैं

चाहे पीछे छूटी हैं

पर लय नहीं टूटी
है

बिल्‍कुल अनूठी हैं


मन है मानस है

पानी है सागर है

भर सकते हैं
वे अपनी

जिनके पास खाली गागर है

अशोक मधुप said...

किसी शायर ने कहा है
दिल पे अपने कोई बोझ न भारी रखिए,
जिंदगी जंग है, इस जंग को जारी रखिए।
शहर नया है दोस्त बनाए रखिए
दिल मिले न मिले, हाथ मिलाए रखिए।
आपकी डायरी का यह नोट बहुत ही अच्छा है,पूरा स्केच बोलता सा लगता है
बधाई

शोभना चौरे said...

jeevan ke vividh rngo ko kitni khubsurti ke sath atmsat kar sbke sath utni hi kushlta se bant leti ho .
mai to tumhari lekhni par mugdh hoo .isi trh likhti rho aur khooshboo ye bikerti raho.
apni si lgi isliye tum kahne se apne aap ko rok nhi pai .
agli kdi ka intjar .

शायदा said...

बहुत सुंदर।
मनीषा, ये सारी सुंदरता उम्‍मीद के कारण ही बची रही है और रहेगी भी। बढि़या लिखा।

Udan Tashtari said...

शानदार लेखन/संस्मरण...विवरण से लग रहा है जैसे सावित्रि बाई फुले गल्र्स हॉस्टल में रहती थी...हमने भी उसी चर्नी रोड पर रह कर बड़े साल गुजारे हैं उसी समुन्द्रर के किनारे. :)

अविनाश वाचस्पति said...

और यह भी कहूंगा कि प्रेम सदा संभावना है तथा सदा ही उत्‍तम भावना है और यह बनी रहनी चाहिए पूरी तरह पूरी होने तक।

मनीषा पांडे said...

@ Shobhana - शोभना जी, बेशक आप मुझे तुम ही कहकर बुलाइए। अच्‍छा लगता है।
@ उड़न तश्‍तरी - समीर जी, पंडिता रमाबाई हॉस्‍टल स्‍टूडेंटृस हॉस्‍टल है और वो भी सिर्फ विल्‍सन कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियों के लिए। बाहर वालों के लिए नहीं। चर्नी रोड में मेरा ऑफिस था और हॉस्‍टल मजगांव में।

ajit gupta said...

मनीषा दूसरी कड़ी का इंतजार रहेगा। जानू से दोस्‍ती कैसे हुई? गिलहरी हाथ नहीं लगती है जल्‍दी से।

pragya pandey said...

अंधेरों की बात बहुत अच्छी कही आपने ...रोशनी तो आँखों में चुभती है .....ये बात भी ज़रूरी है की दिल मिले ना मिलें हाथ मिलाये रखिये .....वैसे आपकी बात में कुछ बात है की सीधे दिल में उतरती हैं आपकी बातें !!

प्रवीण पाण्डेय said...

छोटी छोटी बातें बड़ा मायने रखती हैं । समझ में तब आता है जब अतीत में झाँकते हैं ।

mukti said...

तुम्हारी बातें जैसे मेरी भी बातें हों. मैंने भी दिल्ली के झुलसते दिन और उदास शामें इन्हीं छोटी-छोटी बातों के सहारे काटे हैं. महानगरों में भीड़ में भी अकेलापन रहता है, ये बातें साथ न हों तो जिये कैसे कोई?

Sonal Rastogi said...

लयात्मक लेखन बहा ले जाती है आप अपने साथ

वीरेन्द्र जैन said...

कौन कहता है कि अमृता प्रीतम का निधन हो गया है, वे मनीषा की लेखनी मैं उतर आयी हैं। मुझे अपने कई गीत याद आ रहे हैं पर लिखूंगा नहीं अन्यथा लोग कहने लगेंगे कि मैं हर बार आपकी पोस्ट पर टिप्पणी करते हुये अपना गीत पेल देता हूं जिस कोई पसन्द नहीं करता

anjule shyam said...

nishabd hun..............

Shekhar kumawat said...

बेहतरीन

http://kavyawani.blogspot.com/

shekhar kumawat

अन्तर सोहिल said...

देखो न, दुनिया कितनी सुंदर है

दुनिया सचमुच सुंदर है

मौन हूं….…….….…………

प्रणाम

rakesh said...

मणि,

तुम्‍हारे चाहने वालों की मंडली में बने रहने की गरज से एक शेरनुमा टिप्‍पणी-' मेरे घर की देखभाल को वीरानियां तो हैं, जाले हटा दिए तो हिफाजत करेगा कौन।'

और-'ये खामोशी, ये वीरानी, ये बेगानापन, हम अपने शहर में होते तो घर चले जाते।' लेकिन जिनका कोई घर और शहर ही न हो तो वे क्‍या करें।
भूमंडलीकरण के मौजूदा खुले आसमान से उलट, तुमने अपने इस नितांत 'निजी' क्षेत्र को 'सार्वजनिक' बना ही दिया है तो एक और टिप्‍पणी- तुम्‍हारी छोटी-छोटी बातों में जो सशरीर मौजूद हैं, वे तुम्‍हारा दरवाजा खटखटा रहे हैं। जरा सी मन की किवडियां खोलो तो उन्‍हें हाथ बढाकर छू सकती हो।
एरिक फ्रॉम ने अपनी किताब 'फीयर ऑफ फ्रीडम' में लिखा है कि हम अपनी-अपनी खुर्दबीनी कोठरियां बना कर उनमें कैद बने रहना चाहते हैं। आखिर यथास्थिति की ये कोठरियां भी तो आपके बेहद सुरक्षित रहने का भ्रम बनाए रखती हैं। इनमें से निकलने के लिए जरूरी होता है, अपने आसपास के संसार से दोतरफा संवाद।
तुमने हिंदी में गोल्‍ड मैडल लिया है और तुम जानती हो कि हरेक छोटी-छोटी बात के पीछे कोई-न-कोई कारक होता है। तुम 'छोटी-छोटी' बातों के ऐसे तमाम 'कारकों' के कान पकडकर अपने संसार में क्‍यों नहीं खींच लेती।
राकेश।

पुन: तुम खुश और खिलखिलाती रहो यार। इससे मेरे जैसे तमाम कारकों की जिंदगी भी चैन से गुजरेगी।
राकेश।

Anil Pusadkar said...

han ummeed to hai..............

divya pandey said...

Vishwaas nahi hota ki ab tak aapko kisi ne pyaar nahi kiya.

Sanjeet Tripathi said...

jo chhoti, mamooli chijein/batein hoti hai, shayad unse milkar hi jeevan banta hai... aisa apna man na hai.
aapko yad hoga arundhty roy ne apne novel ka kya nam rakha tha " the god of small things" mamooli chijo ka devta.... us upanyaas ka saar bhi yahi hi tha...

khair,
agli kisht ki pratikshha to kar hi raha hu lekin us se pahle divya pandey jee ki ka dhyan kuchh points pe jaise ki ..
aapki isi post se
"एक पेन और भूरी जिल्‍द वाली वो डायरी, जो मैं उसके घर से उठा लाई थी और क्‍योंकि उसे छूकर मुझे लगता कि वो है मेरे पास। ये सिर्फ दिल के बहलाने का एक ख्‍याल था, जबकि जानती तो मैं भी थी कि दूर-दूर तक कहीं नहीं था वो।"

sath hi aapke hi ek aur post
आवाज का घर-1-2
http://bedakhalidiary.blogspot.com/search/label/%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%20%E0%A4%95%E0%A5%87%20%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%AA%20%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82

par le jana chahunga, shayad unhe apne sawal ka javab mil jaye....

ho sakta hai mai galat hou, par aadmi apni galtiyo se hi sikhta hai.....

waiting for next

Atul CHATURVEDI said...

मनीषाजी काफी सूक्ष्म आब्जर्वेशन है , रेखाचित्र और कहानी-कविता सा मिलाजुला कुछ ...कहानी लिखना शुरु करिए बधाई ।

सुशीला पुरी said...

वीरेंद्र जैन जी की भाषा अच्छी नही लगी ! मनीषा ! आपने बेहद जरूरी बात पर बात की है .

अच्छन मियां said...

manisha ji, agli kist kab aayegi.

Reetika said...

behatreen nazariya... kaafi kuch mere apne anubhav sa...hum bhi kuch 1 - 2 saal isi tareh bhopalmein panaah lene gaye they...dilli ki bhaag daud se...pyara shehar hai..kuch apni hi garmahat liye... UP se aane walon ke liye acchi jageh,...

sushil said...

बहुत अच्छा लिखती है आप,

आभा said...

बिल्कुल सच्चा दिल से निकला एक लेख, जैसे एक अच्छी कविता , जैसे बहुतों के मन की बाद ।ऐसे ही लिखों ,साफ और सच्चा ....

neelima sukhija arora said...

पुरानी डायरी, चिट्ठियां और पोस्ट वाकई एक उम्मीद जगाती हैं, प्रेम की उम्मीद हमेशा रहेगी तुम्हारे साथ

pankaj said...

अच्छी पोस्ट है।
अचानक से दूध नाथ सिंह याद आ गए।