Monday, 2 November 2009

कितना जानता है एक शहर हमें और हम शहर को – 2

जिदंगी और अनुभवों की दुनिया में एक लंबा अरसा गुजार लेने के बाद अपने उस शहर को देखना, जिसने आपका बुनियादी संस्‍कार और मानस गढ़ा हो, जिसने दिमाग और हिम्‍मत के शुरुआती तेवर से लेकर बिजबिजाती हुई भावुकता तक से नवाजा हो, उस शहर को हम किस निगाह से देखेंगे? शहर को देखने की दोनों निगाहें हो सकती हैं। ब्‍लॉगर मीट में मैंने कहा, यह शहर बिलकुल नहीं बदला। बोधि ने तुरंत प्रतिवाद किया। बोले, यह शहर बहुत बदल गया है। क्‍या सही है और क्‍या गलत? दोनों ही नजरें सही हैं शायद। स्‍टेशन से बाहर निकलकर घर जाने के लिए ऑटो पकड़ा तो सिविल लाइंस की जिन सड़कों से होकर गुजरी, उनकी शक्‍ल मेरे बचपन की शक्‍ल से मामूली सा ही मेल खाती थी। शायद यही आधुनिक विकास की एकरूपता है। अब शायद हर शहर का एक पॉश इलाका ऐसा है, जो तेजी से उन्‍नत रहे सभी शहरों में कमोबेश एक जैसा है। बिलकुल वैसा ही मैकडोनल्‍डस, जैसा मुंबई में है या इंदौर में या किसी और शहर में। वैसी ही पारदर्शी कांच वाली चमचमाती हुई दुकानें, मॉल, डिपार्टमेंटल स्‍टोर, नए-नए रेस्‍टोरेंट, रिलायंस फ्रेश, शहर की हर सड़क, गली दीवारों पर पटे हुए टाटा, वोडाफोन, रिलायंस, मूड्स कंडोम और दुनिया को बदल देने वाले आइडियाज के विज्ञापन। वही चमकती शक्‍लें। ये मेरे पहचाने हुए शहर की शक्‍ल नहीं है। तो इस शहर की थकी हुई स्थिरता से बेचैन न होने के लिए यह बदली हुई रौशनीदार रंगत क्‍या काफी नहीं है? सच ही तो कहा था, शहर बहुत बदल गया है।

लेकिन उसी सिविल लाइंस में आज भी भैंस बीच सड़क में खड़ी होकर टै्फिक रोक देती है और लोग रोज-रोज भैंसों की आवाजाही का कोई स्‍थाई हल ढूंढने के बजाय भैंस को बीच सड़क में आराम फरमाता छोड़ शॉर्टकट निकालते हैं और साइड से निकल लेते हैं। टै्फिक की दिशा ही मुड़ जाती है और अब वह बीच सड़क के बजाय साइड से निकलने लगती है। कंडोम के सार्वजनिक विज्ञापनों ने भैंसों की विचार प्रक्रिया पर कोई प्रभाव नहीं डाला है। शहर वालों की प्रक्रिया पर डाला हो तो पता नहीं।

आज भी वहां इंसान द्वारा खींचा जाने वाला साइकिल रिक्‍शा चलता है। लोग वैसे ही हैं। बड़ी फुरसत में बैठे होते हैं और आने-जाने वाली हर लड़की को तब तक घूरते रहते हैं जब तक वो आंखों से ओझल न हो जाए। चलते हुए कोहनी मार जाते हैं। गाड़ी से हों तो आगे निकल चुकने के बाद भी पलट-पलटकर देखते रहते हैं। पार्किंग में खड़ी स्‍कूटर पर बड़े सुभीते से पान खाकर थूकते हुए आगे बढ़ जाते हैं। सफेद स्‍कूटर पर लाल पीक की सजावट शोभायमान होती है।

एक दिन मैं टैंपो से सिविल लाइंस से गोविंदपुर जा रही थी। दिन का समय था। शिवकुटी के पास टैंपो रुकी। उलझे बालों और कोहड़े जैसी भारी नाक वाला एक आदमी उतरा। इसलिए नहीं कि उसे वहां उतर जाना था। उतर तो दूसरे यात्री रहे थे। मिस्‍टर कोहड़ा उतरे, सामने एक दुकान थी, जिसका शटर बंद था। उसने दुकान की तरफ मुंह किया और पैंट खोलकर वहीं टैंपो, आती-जाती सड़क और टैंपो के अंदर बैठी दो लड़कियों के सामने प्रकृति की पुकार पर मैं आया, मैं आया करते हुए लघु शंकाओं से निपटने लगा। सब नजारा देख रहे थे। टैंपो वाला भी मजे से इंजन घर्र-घर्र करते हुए कोहड़ा महाशय के निपटने और लौटने का इंतजार कर रहा था। मजे की बात ये कि उसके बाद मुश्किल से सौ कदम की दूरी पर कोहड़ा ने टैंपो रुकवाया और उतरकर वहीं सड़क पर ही बने हुए एक मकान का गेट खोलकर अंदर चले गए। कमाल है। ये दो मिनट इंतजार नहीं कर सकते थे? हगने-मूतने के लिए सड़क है और गोभी का पराठा चाभने के लिए घर।

कोई तर्क दे सकता है कि हो सकता है बहुत जोर से आ रही हो। हो सकता है मिस्‍टर कोहड़ा को लगा हो कि अभी ही नहीं उबरे तो शायद कभी न उबर पाएं। लेकिन ये तर्क देने वालों को अपने ही तर्क पर शर्म आ सकती है, जब वो देखेंगे कि इस शहर में कितने सारे लोगों को अचानक बहुत जोर से आती रहती है। शहर में इधर-उधर लघुशंकाओं से निपटने के नजारे प्राय: देखे जा सकते हैं। इतना ही नहीं, अपने ही मु‍हल्‍ले में आपको ऐसे नजारे भी दिख सकते हैं कि कोई आदमी अपने घर से बाहर निकले, मोहल्‍ले की सड़क पार करे और फिर वहीं नाली में पद्मासन की मुद्रा में समस्‍त शंकाएं निपटाकर घर में वापस घुस जाए। रसूलाबाद में एक आदमी तब मुझे अकसर ऐसा करता दिखता था, जब मैं छठी कक्षा में पढ़ती थी। उसका घर सामने था, लेकिन मूतने के लिए उसे खुले आसमान और आते-जाते लोगों चेहरों की दरकार होती थी। फाफामऊ में एक बार एक लड़का घर से निकला, मुश्किल से पचास कदम गया और एक की पॉइंट पर जाकर, जहां से भीड़ गुजर रही थी, सड़क पर खड़ा होकर पेशाब करने लगा। तब मैं छोटी थी। आज जिस पर मैं इतने शब्‍द खर्च कर रही हूं, बचपन में यह छवियां मेरे मानस में वैसे ही थीं, जैसे झाडू लगाती मम्‍मी, सड़क पर टहलते कुत्‍ते और गाय। बिलकुल सामान्‍य। इसे देखकर मुझे कुछ विचित्र नहीं लगता था क्‍योंकि बचपन से मैं ऐसे मनोहारी नजारों को देखते हुए ही बड़ी हुई थी।

तो मैं कह रही थी कि पूरा शहर सार्वजनिक मूत्रालय बना हुआ है। गनीमत है शौचालय अभी तक नहीं बना। शौचालय का सबसे सुंदर, मन को मोह लेने वाला नजारा इलाहाबाद स्‍टेशन पर प्‍लेटफॉर्म नंबर एक से भीतर घुसते ही दिखाई देता है, जहां सामने पटरियों पर, इधर-उधर, चहुंओर जहां तक आपकी नजरें जाएं, टट्टी ही टट्टी नजर आए। उसी में अपना भी थोड़ा योगदान के लिए लाल साड़ी वाली एक भारी-भरकम औरत खुद प्‍लेटफॉर्म पर घुटने मोड़े हाजत की मुद्रा में बैठी, अपने चार साल के लड़के को हाथ से थामे, उसकी पीठ पटरियों वाले हिस्‍से की ओर करके उसे हगा रही होती है। कर ले बचवा, अरे न गिरबे, हम पकड़े हई, अरी गोपाल, ई बोतलवा में तनि पानी भर लाव हो…”


10 comments:

बालकृष्ण अय्य्रर said...

आप ने जो और जितना बयान किया, उसमे कुछ भी अनोखा नहीं है, हिन्दुस्तान भर में ये नज़ारे आम है. हां आपके लेख म्रे आये शब्द आम नहीं है. इन शब्दों की कितनी जरूरत यहं थी, विचार करें

अम्बरीश अम्बुज said...

samaj ki buraaiyon par chot karti rachnayein hamesha pasand aati hain mujhe... jarurat hai in adarshon ko jeevan mein bhi utaarne ki..
shukriya, is rachna ke liye...

jai hind...

अनिल कान्त : said...

बहुत पहले जब 12 वीं करने के बाद आर्मी की परीक्षा के सिलसिले में इलाहाबाद जाना हुआ था. मुझे आपका बताया शहर उस समय का सा शहर लगा...लगा कि मैं वही सब देख रहा हूँ जो सन् 1999 में देख रहा था.

कुलवंत हैप्पी said...

मनीषा जी, मुझे शहर और आईना एक जैसा लगता है। सच में...अगर आप आईने के पीछे से अपने चेहरे को देखोगे तो कुछ नहीं दिखाई देगा, आपको पता ही नहीं चलेगा कि चेहरे पर कोई दाग धब्बा है जा वो फेयर लवली लगाकर लगाकर सुंदर हो चुका है, जैसा वो दावा करते है, जो बहुत कम सत्य होता है। और उसकी आईने की दूसरी तरफ वो है जो हमको हमारे चेहरे से रूबरू करवाता है। वो हम पर निर्भर करता है। हम किसको स्वीकारते हैं। एक नजर में शहर नया नया सा हो गया, और दूसरी नजर वो रोड़ पर पेशाब करता आती अभी भी पुराना है। शहर का मैकअप हुआ है, लेकिन उसके भीतर की चीजें शायद अभी नहीं बदली।

Rohit Tripathi said...

Allahabad... kaisa bhi ho bada sukoon milta hai mujhe waha jakar, Allahabd mein kuch kilometer jakar (nawabganj) mein gaon hai mera har saal jata hu waha.. lekin jaisa aapne kaha ki sab badi tezi se badal raha hai par phir bhi kuch hai jo ekdum pahle ki tarah hai

डॉ .अनुराग said...

हिन्दुस्तान के अधिकतर शहर इसी कसबे ओर मोर्डनता के बॉर्डर पर खड़े रहते है ...छह किलोमीटर पे आपको चकचक मॉल दिखेगा ओर उससे आगे बैलगाडी ...मॉल में भी लिफ्ट से खेलकूद करती ओर डरती कई औरते ..पर जब कोई लिखेगा फलां जगह ऐसा तो लोग बिखर जायेगे ...असल में एक बड़ा तबका हिन्दुतान में अभी भी देहाती है ...औरो की जाने दीजिये हमारे यहाँ कितने पढ़े लिखे आकर पूछते है ..हिंदी कंप्यूटर में कैसे ?

pukhraaj said...

सही पकड़ लिया मनीषा ...ये सिर्फ इलाहाबाद का ही नहीं इंडिया के लगभग सभी शहरों का यही हाल है ..लगभग इसलिए कहा की सारे शहर मैंने देखे नहीं है वरना मै लगभग की जगह सारे शहर कह देती

शरद कोकास said...

इलाहाबाद को सबसे पहले मैने धर्मवीर भारती की " गुनाहों का देवता " मे देखा था । एक किस्म का रूमानी बिम्ब बना था इलाहाबाद के बारे में पढकर । यह बिम्ब तब टूटा जब मै , कथाकार मनोज रूपड़ा. महावीर अग्रवाल, छायाचित्रकार अनिल और पेंटर हरि सेन एक कार्यक्रम मे शामिल होने उस शहर मे गये । हम जिस शहर को ढूंढ रहे थे वह नही था और उसकी जगह वह शहर था जिसका बखान आपने किया है । यह परेशानी तो अब हर उस शहर की है जहाँ शहर का विकास करने वालों ने सार्वज़निक मूत्रालय और शौचालय का निर्माण नहीं किया है ।जहाँ किया है वहाँ साफसफाई की व्यवस्था नही की है और जहाँ साफ सफाई भी है वहाँ लोगों को इस तरह संस्कारित नही किया गया है कि वे इन का उपयोग कर सकें । जो पढ़े -लिखे हैं वे भी क्या करें ,व्यवस्था के आगे सब लाचार हैं ।

abcd said...

yeh sirf Allahabad ki nahin New York ki bhi kahan hai (at least Seinfeld mein)

agar george constanza ki maanein to "oh..no..no.. that is very bad for the kidneys" :)

yahan dekhein:
http://www.tbs.com/video/0,,73147|314580|,00.html?eref=sharethisUrl

allahabad ya NYC.. aadmi to wahi hai..

achha aalekh.. thoda jyada "gritty"

बी एस पाबला said...

कहानी हर शहर की
किन्तु
रोचक पोस्ट

इस टिप्पणी के माध्यम से, सहर्ष यह सूचना दी जा रही है कि आपके ब्लॉग को प्रिंट मीडिया में स्थान दिया गया है।

अधिक जानकारी के लिए आप इस लिंक पर जा सकते हैं।

बधाई।

बी एस पाबला