Monday, 9 November 2009

सींखची गुलाब और विलायती चांद की मनमोहक तस्‍वीरें





20 comments:

विनीत कुमार said...

हमें आपकी किताबों में कोई दिलचस्पी नहीं लेकिन घर की सजावट देखकर जलन हो रही है।.

Udan Tashtari said...

अच्छे चित्र.

poemsnpuja said...

ghar bade pyaar se sajaya hai, aur behad kareene se hai...kitabon se jalan to hai hi hamein :)
itna kuch kaise kar leti hain aap?

Arvind Mishra said...

यह अंशकालिक सजावट है या पूर्णकालिक ?

श्यामल सुमन said...

सुन्दरम्। आनन्दम्।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

raj said...

wow!!etni kitabe??
that bond wid books dat once was,it severed now.
v used to smtyms lie wid dem on our chest....
zuba par jayaka aataa tha jo safhe paltne ka,
ab ungali click karne se bas ik jhapki gujarti hai....

विनीत कुमार said...

ठीक होने दीजिए मेरी तबीयत। तब देखिए आपसे भी अच्छी तस्वीरे लगाता हूं अपने अड्डे की।..

मनीषा पांडे said...

तुम तो खामखा की सीनाजोरी पर उतर आए हो। क्‍या कोई कंपटीशन लागू हुआ पड़ा है तुम्‍हारे और मेरे बीच। तस्‍वीरें विलायती चांद और सींखची गुलाब की हैं। मगर उनके बजाय तुम्‍हारी नजरें जाने कहां कहां टिकी हैं। और तिस पर भी जो सबसे कीमती किताबें हैं उनसे तुम्‍हारा ढेला भर वास्‍ता नहीं है। घर न हुआ महारानी विक्‍टोरिया का महल हुआ। अरे यार टपक पडो तुम भी भोपाल। 712 व्‍यंजनों से तुम्‍हारा स्‍वागत करती हूं। फिर तुम्‍हीं लोग ब्‍लॉग पर गाते फिरोगे, जबान की तल्‍खी पर न जाएं। सिमोन द बुआ और फूफा को न कोसें, लड़की में अच्‍छी दुलहन बनने का सारा मटेरियल मौजूद है। बला का खाना पकाती है। तुम सबकी ऐसी की तैसी। अब कोई आए तो भिगोए हुए चने खाए। खाना तो मिलने से रहा।

शायदा said...

अरे तुम्‍हारा घर तो सच में सुंदर है, खुद ही सजाया क्‍या....। बहुत अच्‍छे फोटो हैं और कमाल की बात है कि तुम जरा भी मोटी नहीं लग रही। अनुराग वास्‍तविकता से ज्‍यादा सेहतमंद और गीत जी संभवतया जैसे हैं से ज्‍यादा कमजोर दिख रहे हैं। सब कैमरे की महिमा ही मानी जाए। वैसे ये गुलाब और चांद वाली उपमाएं कहां से आईं और विलायती का फंडा तो बिल्‍कुल सिर से ऊपर गया..।

सुशील कुमार छौक्कर said...

तस्वीरों को देखकर हमारी नजर अपने कमरे पर एक बार फिर से गई। और हर तरफ नई आँखो से देखने लगा। वजह यह है कि हमें भी कमरे को सजाने का शौक है। वैसे हमारी तिरक्षी नजर आपकी किताबों पर भी गई। कमरा पसंद आया। अच्छी फोटो।

शरद कोकास said...

दृश्य में एक शेड वाला टेबल लैम्प , कोने में एक पौधा , दीवान उस पर मसनद ,एक सोफा जिसके पास एक टू-इन-वन, किताबों की एक रैक पर फ्रेम में जड़ी एक तस्वीर , एक चटाई जिसे दीवान के पीछे लगा लिया गया है, पर्दे से छनकर आती हुई ग्यारह बजे की रोशनी , कॉफी के मग .... ।"
आपको क्या लग रहा है मै निर्मल वर्मा की किसी कहानी का पाठ कर रहा हूँ ?

मनीषा पांडे said...

@ Pooja - पूजा,सब हो जाता है। होते होते सबकुछ करने की आदत भी हो जाती है। वैसे तुम अपना मेल आई डी देना जरा मुझे।
@ Arvind Mishra - अरविंद जी जो भी है पूर्णकालिक है। हमेशा ऐसा ही रहता है। जो चीज जहां रख दूं, अगर हाथ न लगाऊं तो बरसों बरस वहीं पड़े रहे।
@ Shayada - तुमसे तो सारे निपटान यहां ब्‍लॉग पर नहीं, फोन पर होंगे।
@ Sharad ji - शरद जी, सचमुच निर्मल वर्मा की कहानी ही जान पड रही है।

बाकी सभी का शुक्रिया।

khadija Ashraf said...

Rilli nice pics......... Anurag Ji u r luking smart haan....!!!
N how can i 4get to compliment a beautiful home.......

ravishndtv said...

रखो तुम अपना भीगा चना। अस्तबल में दे आना। चार कोने की तस्वीर निकाल कर अकड़ना बंद करो। ७१२ व्यंजन कहां से सीखा जी। दाल चावल मिला के हैं या इन्हें हटा के है।

मनीषा पांडे said...

रवीश, तुम तो ऐसे खउआ रहे हो जैसे तुम्‍हें ही मैं भीगा चना खिलाने वाली हूं। और दादा मैं अकड़ी कब। और जहां तक 712 व्‍यंजनों का सवाल है तो जनाब औरत जात की जिंदगी क्‍या खाना पकाना सीना पिरोना किए ही संसार सागर पार होगी। एक अदद पति की उम्‍मीद में मां तो पैदा होते साथ ही रसोई में झोंक देती है और तमाम तरह के व्‍यंजन पकाना सिखाती देती है। ये बात अगल है कि मेरे 712 व्‍यंजनों में एक ही व्‍यंजन में 712 अलग अलग चीजें डालकर पका दी जाती हैं। असली माल एक ही होता है। उललू बनाने का फंडा है। देखो, तुम भी धोखा खा गए ना। समझे हुजूर।

Manish Kumar said...

भाई हम भी घर की ही तारीफ करेंगे क्यूँकि मेहमानों से परिचय कराने कि आप ने जरूरत नहीं समझी। पर्दों का हल्का नीला सफेद रंग बेहद खूबसूरत लगा। किताबों को यूँ सँजोने की हसरत दिल में बनी रहती है पर घर में इसके लिए जगह ही नहीं बचती।

संदीप पाण्डेय said...

मनीषा, मैंने इंदौर और भोपाल दोनों जगहों पर तुम्हारे घर देखे हैं. इसमें कोई शक नहीं की तुमने ये तस्वीरें किसी पेशेवर छायाकार की मदद से खिंचवायीं हैं मैं उसके एंगल और सौंदर्यबोध दोनों का कायल हो गया उसे मेरी ओर से बधाई देना. चित्र सचमुच सुन्दर हैं ????
नोट: और क्या कहूँ कम लिखा ज्यादा समझाना

संदीप पाण्डेय said...

कुछ और बातें जो तस्वीरें देख कर मन में आयीं
१. कम्पनी इन दिनों वेतन अच्छा दे रही है
२.कार्यालयीन बॉस जनों द्वारा देख लिए जाने पर भावी और संभावित वेतनवृद्धि रोके जाने की आशंका है

मनीषा पांडे said...

संदीप तुम्‍हारी जानकारी के लिए बता दूं कि वो पेशेवर छायाकार मैं ही हूं। मैंने ही खींची हैं सारी तस्‍वीरें।

Pankaj Upadhyay said...

न जाने वो कहा से आया था,
और उसने धूप को बादलो से क्यू मिलाया था..
ये बात शायद लोगो को पसन्द नही आयी,
कि मकान छोटा था मगर बहुत सजाया था..

बशीर बद्र की नज़्म सही कर दी आपने.. :)