Sunday, 1 November 2009

सचमुच प्‍यार को दिल में छिपा लेना आसान नहीं है


प्रमोद और स्‍वप्‍नदर्शी जी की बात को आगे बढ़ाते हुए


मेरी पिछली पोस्‍ट छिपा लो यूं दिल में प्यार मेरा‍ पर प्रमोद और स्‍वप्‍नदर्शी जी ने जो कहा, उस बात को समझते और पूरा-पूरा स्‍वीकार करते हुए मैं अपनी बात को थोड़ा आगे बढ़ा रही हूं। यह उनकी और मेरी बातों का खंडन नहीं, विस्‍तार है। उस लेख में 12 साल पुरानी एक घटना को याद करते हुए शायद मैं सिर्फ अपने आप से ही संवाद कर रही थी। सच के और भी जटिल कोण हैं, उस पर निगाह डालने से चूक गई। अच्‍छा किया प्रमोद और स्‍वप्‍नदर्शी जी ने ये बात कही, वरना शायद मैं भी समझ नहीं पाती कि सिक्‍के के दूसरे पहलू को अनदेखा कर मेरी बात भी उसी पाले में जा गिरती, जहां से बाहर निकलने के लिए मैं हाथ मार रही थी।

प्रमोद ने कहा, आपसी समर्पण के समन्‍वयन को भी ऊंचाई तभी मिलेगी, ऐसा मुझे लगता है, जब समर्पित होनेवाले में स्‍वयं की सशक्‍त पहचान हो, स्‍वयं की पहचान के रेशे खुद जब बहुत सुलझे न हों, तो वहां समर्पण और कुछ नहीं शुद्ध ग़ुलामी होगी

- मेरे पड़ोस में एक सुखी-सुखी नजर आने वाला एक जोड़ा रहता है। औरत चकरघिन्‍नी सी पति और बच्‍चों के चारों ओर घूमती रहती है। बड़ी समर्पित नजर आती है और खुश भी। लेकिन क्‍या सच सिर्फ इतना ही है ?

- मेरी मां ने पिछले 30 सालों से पति और दो बेटियों के बाहर कोई संसार नहीं देखा। हमेशा हमारे ही इर्द-गिर्द घूमती रहीं। लगता है बड़ी समर्पित हैं, दुनिया को ही नहीं, मां को खुद भी लगता है कि वो समर्पित हैं। लेकिन मैं जानती हूं और शायद अपने दिल के किसी बेहद निजी कोने में वह भी कि अगर मां के पास बाहरी दुनिया की रोशनी को उन तक पहुंचाने का कोई एक छेद भी होता तो यह समर्पण कितना टिका रहता।

- फिजिक्‍स की लेक्‍चरर मेरी एक बहन को पूरे खानदान में त्‍याग और चरणों में समर्पण की मिसाल माना जाता है। लेकिन उसके दिल के अंधेरे कोने में मैं घुसी हूं कई बार, जहां वह दुखी और अकेली है, लेकिन बाहरी दुनिया के सामने अपनी समर्पिता वाली इमेज को बचाए रखने के लिए वह अपने प्राण भी दे सकती है।

प्रेम में अपने अस्तित्‍व को बिलाकर समर्पित हो जाने की बात एक दार्शनिक अवधारणा है। यह विचार जीवन पर लागू हो, औरत और मर्द दोनों उसे अपनी जिंदगियों में उतार सकें, इसके लिए हमारे गरीब, दुखी, चोट खाए मुल्‍क को पता नहीं कितने सैकड़ा वर्ष का सफर तय करना होगा। मेरे आसपास सचमुच ऐसा कोई रिश्‍ता नहीं है, जिसमें ऐसा समर्पण नजर आता हो। जो इस समर्पण गीत से अभिभूत हैं, खुद उनकी जिंदगियों में भी यह नहीं है। मेरी जिंदगी में भी नहीं है। मैं किसी निजी प्रेम गीत में नहाई हुई यह बात नहीं कह रही हूं। मैं कल को किसी संबंध में जाऊं तो कौन जानता है और मैं खुद भी नहीं जानती कि उसके पीछे कितनी सारी सामाजिक, भावनात्‍मक असुरक्षाएं, मन, देह से लेकर आर्थिक जरूरतों तक के कितने तुच्‍छ और उदात्‍त समीकरण होंगे। ऐसे में ऐसा अमूल्‍य समर्पिता भाव कहीं आसमान से तो नहीं टपक सकता। सीधी सी बात है कि जिस समाज में अभाव और असुरक्षा की जड़ें इतनी गहरी हों, लगभग सभी रिश्‍तों के पीछे बहुत घटिया नहीं तो भी एक किस्‍म का जीवन को थोड़ी सुरक्षा, थोड़ा सुभीता मिल जाए, वाला कैलकुलेशन सक्रिय हो, वहां ऐसे उदात्‍त रिश्‍ते संभव नहीं हैं।

स्‍वप्‍नदर्शी ने कहा कि Is it so simple. मैं दुख और निराशा से भरकर कहती हूं, नहीं बिलकुल नहीं। कम से कम मेरे समय में तो यह असंभव की हद तक मुश्किल है।

जिस समाज का लात खाते रहने का लंबा औपनिवेशिक इतिहास न हो या जो कम से कम चेतना और कर्म के स्‍तर पर अभाव और गुलामी के उस मानस से बाहर आया हो, जहां कम से कम इतना तो हो लोगों का सामान्‍य स्‍वस्‍थ मनोविज्ञान बन सके, उनका थोड़ा स्‍वस्‍थ विकास हो सके, जहां इतनी गरीबी न हो कि एक अदद नौकरी और इकोनॉमिक सिक्‍योरिटी जिंदगी के सबसे बड़े सवाल हों क्‍योंकि आपका देश इस बात की कोई गारंटी ही नहीं करता कि आपको अच्‍छा, सम्‍मानजनक काम मिलेगा ही, अच्‍छी शिक्षा मिलेगी ही, आप बीमारी से इसलिए नहीं मरेंगे कि आपके पास पैसे नहीं या डॉक्‍टर को आपके इलाज से ज्‍यादा इस बात की चिंता हो कि वह मारुति बेच हॉन्‍डा सिटी कैसे खरीदे या अपने बच्‍चे को लॉस एंजिलिस कैसे भेजे। तो एक ऐसे समाज में जहां बड़ी मामूली इंसानी इज्‍जत भी मुहैया न हो, जहां हम सिर्फ इस संघर्ष में ही पूरी जिंदगी निकाल दें कि प्‍लीज, हमें कुत्‍ता नहीं, आदमी समझो तो ऐसे समाज में कुछ उदात्‍त समर्पित प्रेम और बहुत ऊंचा मानवीय धरातल कैसे संभव होगा?

लेकिन इन सबके बावजूद जो मैं कहना चाह रही थी और जो अब भी कह रही हूं, वह बस ये एक अन्‍याय और क्रूरता के प्रतिकार में हम कुछ कोमल, सुंदर विचारों का भी प्रतिकार कर देते हैं। मेरा समय इस बात की इजाजत नहीं देता कि ऐसा उदात्‍त समर्पण मुमकिन हो, लेकिन मुझे यह विश्‍वास करना चाहिए कि ऐसा होता है और ऐसा होगा। अगर बेहतर दुनिया की बातें मुगालता नहीं हैं तो यह प्रेम भी मुगालता नहीं है। औरताना बताए जाने वाले गुण सड़े हुए नहीं हैं। आप ये पॉलि‍टिकल स्‍टैंड ले सकते हैं कि उन गुणों को अपनी जिंदगी में उतार लेने को एक खास देश-काल में मुल्‍तवी कर दें लेकिन गुणों को ही सुपुर्द-ए-डस्‍टबिन न करें।

इस थोड़ा और साफ करने के लिए सिमोन बोवुआर ने एक जर्मन पत्रकार से एक इंटरव्‍यू के दौरान जो कहा था, वो यहां कोट कर रही हूं

औरतों में प्रतिद्वंद्विता और एक दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति नहीं होती है। सहनशीलता और धैर्य, जो एक सीमा तक तो खूबी होते हैं, लेकिन उसके बाद कमजोरी में तब्दील हो जाते हैं, भी औरतों का एक खास गुण है। औरतों में अपनी विडंबनाओं की समझ भी होती है, एक खास किस् की सरलता और सीधापन। ये स्त्रियोचित गुण हमारे लैंगिक अनुकूलन और उत्पीड़न की उपज हैं, लेकिन यह गुण अपने आप में बुरे नहीं हैं। ये हमारी मुक्ति के बाद भी बरकरार रहने चाहिए और पुरुषों को ये गुण अर्जित करने के प्रयास करने होंगे।



14 comments:

sachkahun said...

वाहियात, लगता है किसी रिश्ते में बंधी नहीं हैं कभी इमानदारी से, इसलिए किसी अच्छी और भली पत्नी का पति और बच्चों की तरफ समर्पण और प्यार भी आपको ब्लॉग लिखने का मसाला दे देता है। अगर पति अपनी पत्नी और बच्चों के चारों तरफ घूमता रहता तब आपको वो भी गलत लगता। दुनिया में सबसे बड़ा पुण्य होता है अपने परिवार को सही से खुशी देते हुए चलाना.. और अगर कोई औरत ऐसा कर रही है तो वो किसी भी तरह से गलत नहीं है। उसके लिए अगर वो अपने पति या बच्चों को झेलती है(जैसा आपको लगता है), शायद उसमें कोई गलती नहीं है। दूसरी बात ये है कि अगर आपको घर से बाहर का ही सोचने में जिंदगी बितानी हो तो कैसे आपका घर सही रहेगा। फिर आप जैसे लोग इस बात पर लिखेंगे कि कैसे घर खराब होते हैं।

महेन्द्र मिश्र said...

औरतों में प्रतिद्वंद्विता और एक दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति नहीं होती है। सहनशीलता और धैर्य, जो एक सीमा तक तो खूबी होते हैं, लेकिन उसके बाद कमजोरी में तब्‍दील हो जाते हैं, भी औरतों का एक खास गुण है ।

आपके उपरोक्त विचारो से सहमत

मनीषा पांडे said...
This comment has been removed by the author.
मनीषा पांडे said...

सच कहूं ने सच ही लिखा है। हिंदुस्‍तान के अधिकांश पुरुष ऐसे ही सच सोचते और कहते हैं। सच है।

अभय तिवारी said...

हो गया बंटाधार.. एक लड़की उदात्त प्रेम के नशे में झूम रही थी.. दुनिया वालों ने उसका सारा नशा माठा कर दिया.. ठीक ही कहा ये दुनिया है ही प्यार करने वालों की दुश्मन.. बेड़ा गर्क हो प्रमोद भाई और स्वप्नदर्शी का (खुद तो स्वप्न में रहती हैं और दूसरे के स्वप्न के गुब्बारे को देखते ही 'इस इट दैट सिम्पल' की सुई चुभा देती हैं)..
अब लो झेलो सिमोन को.. सिमोन से कौन पंगा लेगा..
वैसे लेने वाले ले ही रहे हैं..
स्माइली न लगाने से लोग मेरे पीछे न पड़ जायं इस लिए स्माइली लगा रहा हूँ..
:)

SP Dubey said...

अपना समर्पण तो जो अपना होगा उसी को होगा और जो अपना होगा वह अपना शोषण नही करेगा, वह तो अपने समर्पण मे, अपने को भी समर्पित कर देगा…ऐसा वही होसकता है जो अपने से अभिन्न हो॥
अपने से भिन्न मे, अपनी खोज युक्ति उक्त नही है, और अपने से भिन्न मे अपने को खोज ले, ऐसा अनुभव भी अपना नही है।

अत्यन्त कठिन मर्ग पर यत्रा चल पडी है, पर असंभव नही है लक्ष प्राप्ती। विश्वाशिओ का विश्वास आज तक नही टूटा है, चलते रहने पर अवश्य मानवीयता के उस उच्च धरातल पर पहुचते है,
जहां इतना प्रेम और करुणा है जो अपने मे समाती नही है, उसी प्रेम करुणा (मानवता) के हम पुजरी है जो स्त्रि और पुरुष दोनो मे है जिससे देश काल की दूरी नही है।
यद्यपि ऐसा साधरणतया सर्वत्र दिखाइ नही देता है, यह अपना द्रिष्टि दोष है, अपना द्रिष्टि दोष मिटाने की जिम्मेदारी अपनी है। मेरे देखे यह समस्या स्त्रि पुरुष दोनो की है।
मानव को स्त्रि और पुरुष मे विभाजित नही किया जा सकता है, स्त्रि मानव की मां है और पुरुष मानव का पिता, दोनो मे समता है, विसमता होने पर मानव की संभावना ही समाप्त हो जायेगी।
अपनी समझ मे जो नासमझ है, वह दया और उदारता के पात्र है, नासमझ होना प्राक्रितिक दोष नही है, समझ कर नासमझ बनना दोष है, जो समझते है उनका कर्तव्य है, कि नासमझ को समझाए, और
ना समझा सके, तो वह समझदार होने के मिथ्या अभिमान से, समझदारी के साथ मुक्त हो, मिथ्या अभिमान से मुक्त होने पर अपना कल्याण अपने द्वारा कर सकने की क्षमता स्वत: उत्पन्न होगी ।
जो समस्त विकरो को खा कर निर्विकार, एव नि:श्कामता प्रदान करने मे हेतु हो कर, जिसमे अपना विश्वस है उसमे समर्पण स्वत: हो जायेगा ॥ ( करना नही पडेगा ) समर्पण के पश्चात जिसकी प्रप्ती होगी,
उसका वर्णन करेने नही आता, वह वर्णन से परे है क्वचित् उसे ही "प्रेम" कहते है

अनिल कान्त : said...

आपके लेख से काफी हद तक प्रभावित और सहमत भी

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

"Man's love is of man's life a part; it is a woman's whole existence. In her first passion, a woman loves her lover, in all the others all she loves is love." - Lord Byron

शायदा said...

मनीषा जी
आपकी ज्ञानवर्धक और विचारणीय पोस्‍ट वास्‍तव में प्रभावित करने वाली है। इन्‍हीं विचारो के साए में बैठकर मैं महज इतना ही सोच पा रही हूं कि सचमुच ये दुनिया जो है न किसी को ढंग से समर्पित होते हुए भी नहीं देख सकती, प्रेम में डूबी एक पोस्‍ट को पढ़ने तक से परहेज...उफ क्‍या करें बताइए आप ही ।
स्‍माइली लगानी नहीं आती, इसलिए लगी हुई समझें।

शरद कोकास said...

मनुश्य के कुछ गुण उसकी सामाजिक स्थिति से भी तय होते हैं। पुरुष और स्त्री दोनो ही अपनी विरासत को ढो रहे हैं । स्त्रियों के गुण पुरुष कैसे अपनायेगा उसका अहं उसे इस तरह करने नहीं देगा । समर्पण की परिभाषा पुरुष की अपनी बनाई हुई है उसने इसे खानों मे बाँट दिया है । पुरुष अपने माता-पिता के प्रति समर्पण का भाव रखे और स्त्री अपने पति व बच्चों के प्रति। यहाँ आर्थिक स्वावलम्बिता प्रमुख हो जाती है और अन्य सभी बातें गौण । मेरी एक लम्बी कविता है "पुरुष" उसकी अंतिम पंक्तियाँ याद आ रही हैं...
अपने दायित्व बोध के साथ
अब तक जुटा है पुरुष
एक भ्रम बना रखा है उसने अपने इर्दगिर्द
जो कछुए के कवच की तरह
उसकी रक्षा करता है

वह सोचता है
पृथ्वी उसकी पीठ पर टिकी है ।
.. ..शरद कोकास

मनीषा पांडे said...

शायदा, पहले तो "मनीषा जी" और उसके बाद "ज्ञानवर्द्धक और विचारणीय।" बार रे। यार थोड़ा तो समझा कर, मेरा पेट खराब हो जाएगा।

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

ये अभय जी क्या कह रहे हैं? :-)

स्वप्नदर्शी said...

"स्‍वप्‍नदर्शी ने कहा कि Is it so simple. मैं दुख और निराशा से भरकर कहती हूं, नहीं बिलकुल नहीं। कम से कम मेरे समय में तो यह असंभव की हद तक मुश्किल है।'

Manisha,

This could be one interpretation of my previous comment, but I actually meant that, the images/"bimb" we take for granted, have not always existed, indeed have developed during a long period of human civilization and therefore, the behavior of cat for example you have taken for granted is a result of animal domestication. Similarly romanticism of all kind, although is a very personal sphere but the the thread are not spontaneous and
out of context with long history of human journey. I suggest have a look at "The Romantic Manifesto".
Also the concept of surrender in love and possessions of lovers almost like a personal property are not out of context.

मनीषा पांडे said...

Swapndarshi Ji,

I am completely agree.