Wednesday, 28 October 2009

छिपा लो यूं दिल में प्‍यार मेरा

क्‍या हम जीवन में कुछ भी सहज और स्‍वाभाविक होते हैं? सबकुछ ओढ़ा-बिछाया सा न हो। बिलकुल सहज, जैसे बारिश की बूंदें, जैसे फूलों का खिलना, जैसे उत्‍तरी से दक्षिणी ध्रुव तक हर दौर और हर सभ्‍यता में एक खास उम्र में आकर हर लड़की और लड़के के मन में प्रेम का उपजना, जैसे सहज रूप से बिल्‍ली का आकर दूध चट कर जाना। हम गरीब, पिछड़े, सामंती मुल्‍क के बनाए नियमों को नहीं मानते। यह स्‍वत: नहीं हो जाता, ऐसा करने के लिए हम अपने आपसे और अपने आसपास की दुनिया से लगातार एक युद्ध लड़ते होते हैं और अगर आदमी सचेत न हो तो वह निरंतर संघर्ष हमें इतना विरूप कर देता है कि न लकीर के उस पार और न इस पार ही हम एक सहज मनुष्‍य रह जाते हैं।

आज से तकरीबन 12 साल पहले एक बार इलाहाबाद में गंगा के तट पर एक दोस्‍त के साथ बैठे हुए अचानक ही मेरे मुंह से यह गाना फूट पड़ा - छिपा लो यूं दिल में प्‍यार मेरा कि जैसे मंदिर में लौ दिए की। किसी बड़ी गहरी भावना में भरकर मैंने कहा, यह गीत मुझे बहुत पसंद है।
वह दोस्‍त खुद को नारीवादी कहती थी। मुझे पता नहीं, नारीवाद क्‍या था, लेकिन जो भी था, उसी ने हमें यह स्‍पेस दिया था कि हम बिलकुल निर्जन गंगा के तट पर जाकर बैठ सकते थे, गाना गा सकते थे और ऐसे तमाम काम कर सकते थे, जो मेरे परिवार, पड़ोस और शहर की लाखों लड़कियों के संसार में दूसरे ग्रह की बात थी।
लेकिन ये गाना सुनते ही वह बिदक गई। बोली, बकवास है। दिस सांग इज शिट। कैसे कोई औरत खुद से खुद को उठाकर चरणों में रखने की बात कर सकती है। कुछ सेल्‍फ रिस्‍पेक्‍ट, कुछ डिग्निटी है कि नहीं। और व्‍हॉट इज दिस शिट मंदिर। दिस सांग इज पॉलिटिकली ए शिट।
इतना तो मैंने सोचा ही नहीं था। गाना अच्‍छा लगता था बस। गाने के पॉलिटिकल स्‍टैंड के बारे में न सोच पाने की कमजहनी के कारण मुझे थोड़ी हीनभावना सी महसूस हुई। एक औरत खुद को उठाकर आदमी के चरणों में गड़ाए दे रही है और मैं उस गाने की तारीफ कर रही हूं। आय एम ऑलसो पॉलिटिकली ए शिट।
उस बात को 12 साल गुजर गए और पॉलिटिकली शिट होने के बावजूद मैं उस गाने को आज तक नापसंद नहीं कर पाई।
हमने अपने परिवेश में औरत को कीड़े-मकोड़ों की तरह जीते, अपमानित होते, पिटते, छेड़े जाते, बलात्‍कार होते और जलाए जाते देखा था, इसलिए होश संभालने के साथ ही हम उस पूरे समाज के प्रति विरोध की एक तलवार ताने ही बड़े हुए। मार-मारकर लड़की बनाए जाने का विरोध करने की कोशिश में पता ही नहीं चला कि कब हम मनुष्‍य भी नहीं रह गए। स्त्रियोचित गुणों की लिस्‍ट जलाकर खाक करने के चक्‍कर में हमने सारे इंसानी गुण भी जला डाले। त्‍याग, प्रेम, दया ममत्‍व, सहनशीलता, सहिष्‍णुता, उदारता, जिसे औरत का गुण बताया जाता था, उन सारे गुणों को हमने पानी पी पीकर कोसा, उस पर थूका, उसे लानतें भेजी। लेकिन हम नहीं समझे कि इस हर कदम के साथ हम कमतर मनुष्‍य होते जा रहे थे - हर समय युद्ध की मुद्रा में तैनात, प्रतिक्रियाओं और विरोधों से भरे हुए।
ये सच है कि हमारा समय सचमुच बहुत कठिन था। हमारे दुख, हमारे जीवन की त्रासदियां मामूली नहीं थीं। उन्‍हें हल्‍के में उड़ाकर जिम्‍मेदारी से पल्‍ला नहीं झाड़ा जा सकता। उस दुनिया से लड़ने के अलावा कोई और राह भी नहीं थी, लेकिन हमारी लड़ाई के तरीके भी उतने ही संकीर्ण और सामंती थे, जितना कि वह समाज जिसके खिलाफ हम लड़ रहे थे। हमने कभी ये नहीं सोचा कि लड़ाई का यह तरीका हमारी दुखभरी जिंदगियों में और जहर घोल देगा।
हमें आपत्ति थी त्‍याग, प्रेम, दया ममत्‍व, सहनशीलता, सहिष्‍णुता, उदारता जैसे तमाम गुणों को सिर्फ औरत की बपौती बनाए जाने से, लेकिन क्‍या हम इन गुणों को ही जलाकर खाक कर सकते थे? जिस उन्‍नत और बेहतर मनुष्‍य समाज की हम बातें करते थे, उस समाज में क्‍या ये गुण औरत और मर्द दोनों में नहीं होने चाहिए थे? मर्द इनकी आड़ में औरत का शोषण करते हैं, यह गलत है। लेकिन एक सुंदर दुनिया में ये गुण पुरुषों में भी उतने ही होंगे, जितने कि स्त्रियों में।
इतिहास में ऐसा भी समय आता है, जब दुखी, अभावग्रस्‍त और उत्‍पीडित सभ्‍यताएं वास्‍तविक गहरे प्रेम की नमी और ऊष्‍मा को बचा नहीं पातीं। लेकिन प्रेम में किसी के चरणों में खुद को समर्पित कर देने की चाह बहुत मानवीय है। यह सभी मानवीय सभ्‍यताओं में रहेगी। ऐसे स्‍पार्टाकस होंगे, जो पशुओं से भी बदतर यंत्रणामय जीवन जीने के बावजूद उस बिलकुल निर्वस्‍त्र विवर्ण पथराई हुई बाजारू औरत, जिसे उसे संभोग के लिए दिया गया हो, की देह छूने के बजाय, उसकी ओर कपड़े का एक टुकड़ा बढ़ा देंगे और उसे धीरे से बैठ जाने को कहेंगे। प्रेम में समर्पण बहुत मानवीय है। यह दोनों ओर से है। यह स्‍त्री का शोषण नहीं है। हर अमानवीयता का प्रतिकार करते हुए भी अपने भीतर की मानवीयता को बचा लाना है। प्रेम में सचमुच किसी पुरुष के चरणों में समर्पित हो जाना है। बेशक, वह भी इतना ही समर्पित होगा। ये बात अलग है कि उस समर्पण में कोई नाप-तौल नहीं होगी।

25 comments:

अनिल कान्त : said...

सही कहा मनीषा जी आपने अपने लेख में.
मानवीयता का कोई मापदंड नहीं...की वह स्त्री के लिए है या पुरुष के लिए
लेख पढ़कर अच्छा लगा

(किसी इंसान के जीवन और उसके विचारों से हमें खुद भी विचार मिलते हैं और हम सीखते हैं...ये मैं महसूस कर रहा हूँ )

Kishore Choudhary said...

बहुत सुंदर !

pukhraaj said...

मनीषा , मै आपकी बात से सहमत हूँ या यूँ कहूँ कि तुमने मेरे मन कि बात कह दी है ...ख़ास तौर पर तुम्हारी लिखी अंतिम पंक्तियाँ ...."प्रेम में सचमुच किसी पुरुष के चरणों में समर्पित हो जाना है। बेशक, वह भी इतना ही समर्पित होगा। ये बात अलग है कि उस समर्पण में कोई नाप-तौल नहीं होगी। " इनमे सच कोई जादू है जो आज कि स्त्री को समझने कि आवश्यकता है ....
समर्पण प्यार कि पराकाष्ठा है ...स्त्रीत्व गुणों का त्याग कर मर्दों से बराबरी के चक्कर में स्त्री ने खुद अल्प वस्त्र धारण करने का जो नियम बनाया है वो इन मर्दों कि बराबरी का सौदा नहीं है ....बराबरी करनी ही तो स्तियोचित गुणों को मर्दों के ह्रदय में जगाकर करनी थी .... कुछ कामों में उनकी तरह जीने का मन बनाया तो कुछ बातों में उन्हें अपने जैसा बनाने कि कोशिश भी करनी चाहिए ....परिवर्तन प्रकर्ति का नियम है ...पर वक़्त तो लगता है ....
वैसे " छुपा लो दिल में ..." मेरा भी पसंदीदा गीत है ....पर मै इसे किसी इंसान के लिए इसे नहीं गाती....

ओम आर्य said...

प्रेम मे सचमुच मे नाप तौल अच्छी बात नही पर समर्पण तभी आता है जब प्रेम होता है ............प्रेम से सबकुछ सम्भव है !बढिया लेख!

SP Dubey said...

आप का यह लेख पढने के पस्चात अनुमान है एक संतुलित एवं परिपक्व सोच विचार है, लेख के अंतिम वाक्यों मे जो अभिव्यक्ती है अत्मविभोर कर दिया। अनुमानत: अपने बेटिओ जैसी लग रही हो इसलिए "आशिर्वद"
"यह दोनों ओर से है। यह स्‍त्री का शोषण नहीं है। हर अमानवीयता का प्रतिकार करते हुए भी अपने भीतर की मानवीयता को बचा लाना है। प्रेम में सचमुच किसी पुरुष के चरणों में समर्पित हो जाना है। बेशक, वह भी इतना ही समर्पित होगा। ये बात अलग है कि उस समर्पण में कोई नाप-तौल नहीं होगी।"

Nirmla Kapila said...

मनीशा जी लाjaज्वाब पोस्ट है निशब्द हूँ कि इतनी गहराइ से आपने इस विषय पर ये सुन्दर आलेख लिखा। धन्यवाद और शुभकामनायें

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

छुपा लो यूँ दिल में प्यार मेरा
कि जैसे मंदिर में लौ दिये की

तुम अपने चरणों में रख लो मुझको
तुम्हारे चरणों का फूल हूँ मैं
मैं सर झुकाए खड़ी हूँ प्रियतम
कि जैसे मंदिर में लौ दिये की

ये सच है जीना था पाप तुम बिन
ये पाप मैने किया है अब तक
मगर है मन में छवि तुम्हारी
कि जैसे मंदिर में लौ दिये की

फिर आग बिरहा की मत लगाना
कि जलके मैं राख हो चुकी हूँ
ये राख माथे पे मैने रख ली - २
कि जैसे मंदिर में लौ दिये की.

"दिस सांग इज पॉलिटिकली ए शिट!"

दि शिट कुड बी इन दि माइंड अ बिट!

Pramod Tambat said...

बात काफी विचारोत्तेजक हैं । काश हम अपने जीवन में समाज का वह रूप देख पाएँ जब यह मौजूदा शोषण, दमन, उत्पीड़न से मुक्त होकर स्त्री-पुरुष दोनों में नैसर्गिक प्रेम की मजबूत पृष्ठभूमि की सृष्टि कर सके ।

प्रमोद ताम्बट
भोपाल
www.vyangya.blog.co.in

शोभना चौरे said...

prem sirf smrpn hi hai smrpn me ashaye kaisi ?.

Priyankar said...

"इतिहास में ऐसा भी समय आता है, जब दुखी, अभावग्रस्त और उत्पीडित सभ्यताएं वास्तविक गहरे प्रेम की नमी और ऊष्मा को बचा नहीं पातीं। लेकिन प्रेम में किसी के चरणों में खुद को समर्पित कर देने की चाह बहुत मानवीय है। यह सभी मानवीय सभ्यताओं में रहेगी।"

यही प्रेम और यही ऊष्मा मनुष्य को उदात्त बनाती है . कोई गांधी या दलाई लामा जब कहता है कि ’प्रेम का कोई विकल्प नहीं है’ या गालिब जब कहते हैं ’आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्सां होना’ तब वे मनुष्य के भीतर बह रहे इसी मानवीय प्रेम के गुनगुने स्रोत की ओर इशारा करते हैं जो पीड़ा और हताशा में कभी-कभी शुष्क-सा होता दिखने लगता है .

अभय तिवारी said...

बहुत अच्छा लिखा है मनीषा। मैंने अकसर पाया है कि नारीवाद के नाम पर लड़कियाँ उन सारे गुणों के खिलाफ़ खड़ी हो जाती हैं जो बहुसकंख्यक महिलाओं में सहज मिलते हैं - जैसे परिवार और बच्चों को ही अपना सर्वस्व मान लेना। नारीवाद इस मानयता को जड़ से उखाड़ने में नहीं.. इसे इसकी मानवीय गरिमा प्रदान करने में हो तो मुझे अधिक सार्थक लगेगा। बाक़ी तो सबसे अपने-अपने अर्थ हैं।
तुमने प्रचलित मान्यता के विरुद्ध जा कर अपने भीतर की आवाज़ को तरजीह दी, ये सब से बड़ी बात है।
इसी राह पर चलकर बड़ा सृजन होता है..

डॉ .अनुराग said...

.किसी वाद का तो नहीं पता ...बस हमारा मानना है आप इन्सान बने रहिये .....बाकी दुनिया अपने आप बेहतर हो जायेगी

Atul CHATURVEDI said...

प्रेम तो समर्पण का ही दूसरा नाम है , लेकिन आजकल के भौतिकतावादी जीवन में कहाँ लोग ये समझते हैं । आपके विचार काफी सहज और यथार्थवादी हैं

कंचन सिंह चौहान said...

इस गीत का शीर्षक पढ़ कर चली आई। ये गीत मुझे बहुत अधिक पसंद है और रही बात किसी नारी के पैरों में डाल देने की, तो ये गीत तो युगल गीत है। इसमें तो पुरुष भी वही बात कहता है। गीत में तो दोनो के समर्पण की पराकष्ठा है। इस गीत को सुने तो शायद समझ में आता है कि किसी के स्नेह में खुद को विलय कर देना कितना सुखद होता है जहाँ चाह ही नही होती अपना अस्तित्व बचाये रखने की....!

वैसे ये मेरे अपने विचार थे। विपरीत सोचने वालों के अपने तर्क होंगे....!

शुक्रिया यहाँ तक ले के आने का...!

rakesh said...

Jo tu hai to me nahi, Jo me hun tu nahi,
Prem gali ati sankari Ja me dou na samahi.

AUR---

Manzile gam se guzarna to tha aasan Ekbal,
Ishq to naam hai khud hee se guzar jane ka.

AUR---

Muqam Faiz koi rah me jancha hee nahi,
Jo ku-e-yaar se nikle to su-e-daar chale.

Esme su-e-daar kahan hai, Mani???

शरद कोकास said...

"इतिहास में ऐसा भी समय आता है, जब दुखी, अभावग्रस्‍त और उत्‍पीडित सभ्‍यताएं वास्‍तविक गहरे प्रेम की नमी और ऊष्‍मा को बचा नहीं पातीं। लेकिन प्रेम में किसी के चरणों में खुद को समर्पित कर देने की चाह बहुत मानवीय है। यह सभी मानवीय सभ्‍यताओं में रहेगी। ऐसे स्‍पार्टाकस होंगे...
"
और मनुष्य जीवन के ये मूल राग जब बचे रहेंगे तभी इस संसार मे मनुष्य् नाम की यह प्रजाति बची रहेगी । ऐसे स्पर्टाकस भी जन्म लेंगे जो इनसे रहित मनुष्य द्वारा किये जा रहे उत्पीड़न के खिलाफ सर उठायेंगे। वाह मनीषा जी ..आपके चरण कहाँ हैं ?

Pramod Singh said...

ओहोहो. अहाहा.. और लगे हाथ उसके बाद आह, अरे एटसेट्रा_
चलते-चलते पता नहीं क्‍या है उड़ने की जगह मैं अटक जा रहा हूं, और पता नहीं क्‍यों है अभय बाबू की तरह इसी राह पर चलकर बड़ा सृजन होता है सहज रुप से कह देने की जगह मुझे भय होने लगता है! आपसी समपर्ण के समन्‍वयन को भी ऊंचाई तभी मिलेगी, ऐसा मुझे लगता है, जब समर्पित होनेवाले में स्‍वयं की सशक्‍त पहचान हो, स्‍वयं की पहचान के रेशे खुद जब बहुत सुलझे न हों, तो वहां समर्पण और कुछ नहीं शुद्ध ग़ुलामी होगी. अभी कितने महीने गए तुम्‍हारी मनीषा मेधा तुम्‍हें पतनशील बनवा रही थी, कुछ प्रदर्शनप्रियता की हद तक खी़चे लिए जा रही थी? अब दूसरे छोर पर खड़ी तुम एक दूसरा गाना गा रही हो, इस छोटी सी अवधि में इस दरमियान ऐसा नाटकीय क्‍या हो गया? एक अदद प्रेम से, सामनेवाले की आंखों में तुम्‍हें अपनी एक उदात्‍तता और नयी गरिमा दिख गई? उसीसे पतनशील बिला गया, नया, चमकदार समर्पणभाव आ गया? कल को सामनेवाली फिज़ा बदलेगी, उस रौशनी में फिर तुम अपने बारे में कोई और समझ बुनने लगोगी? सबसे बड़ा सिरदर्द तो अपने बारे में समझ का इस तरह कातर, अन्‍यान्‍योआश्रित होना है, आप वह समझ दुरुस्‍त कर लें, भारतीय समाज में अपने बाबत ऐसी तीक्ष्‍ण समझ बना सकें, फिर आप 'समर्पित' हैं या पतनग्रसीत हैं, घेले भर का फर्क नहीं पड़ता, सवाल है 'तितली उड़ी, उड़के चली' के हुलुलू गाने के मुग्‍धभाव से अलग वह समझ आपने कितनी बनायी है, नहीं बनायी है तो 'ओह, सखी, ऐसी मैं' का फुदुर-फुदुर भाव निहायत तक़लीफ़देह है.

rakesh said...

Pramod Singh ki baat me dam hai. Use samjhogi to par lagogi! Tun kar sakti ho esa. One more thing-- Interact with your time, which is what you are not doing at all. Try to come out of your shell and look at the world around you.

शायदा said...

मनीषा
गाना मुझे भी काफी पसंद रहा है एक ज़माने में। अब भी अच्‍छा लगता है। प्रेम में समर्पण बहुत सहज है। कभी आप बच्‍चे सा निरीह महसूस करते हैं तो कभी बहुत शक्तिशाली, सो कॉल्‍ड इंटलेक्‍ट के चक्‍कर में पड़कर अक्‍सर इन भावों की व्‍याख्‍या में टेढ़े होते स्‍त्री और पुरुष दोनों की देखे गए हैं, ये बात दीगर है कि खुद उनके मन में गहरी काली रातें ऐसे ही किसी निरीह बच्‍चे सा बन किसी गोद में दुबक जाने की गहरी चाह कभी मर नहीं पाती। डॉ अनुराग की बात बहुत सही लगी, सारा मामला इंसान बने रहने भर का ही है, वैसे नारीवाद तो कभी मुझे समझ वैसे भी आ नहीं सका।

अभय तिवारी said...

प्रमोद जी की बात पर कान मत दो.. अभी जो दिल में है उसे महसूस करो.. जब वो पल आएगा तब वो महसूस करना.. उनकी राय पर चलकर तुम एक सशक्त, संतुलित, और संयत नारी ज़रूर बन जाओगी.. कलाकार का क्या होगा..? हाय मैं कहीं ग़लत तो नहीं कर रहा..ग़लत तो नहीं महसूस रहा..? क्या ग़ुलामी होगी और क्या पतनशीलता, इसका विश्लेषण करते आप एक्टिविस्ट बने रहेंगे..

समझ अपनी जगह है वह पढ़ने लिखने से बनती है.. अपनी भावनाओं को दबा कर, फ़ूंक-फ़ूंक कर, सहम-सहम कर चलने से तो हो चुकी कला और हो चुका सूजन..कलाकार को ज़रा उड़ने दीजिये प्रमोद भाई..

स्वप्नदर्शी said...

काश कि दूनिया सिर्फ इतनी ही होती
कि एक बुलबुले के भीतर जीवन होता
एक प्यारा पति और कुछ दर्ज़न भर प्यारे बच्चे
बटुए मे कुछ नोट, और यही समर्पण का राग,
चार पहर बज़ता काफी होता
कभी खूबसूरती पर इतराते
कभी सिल्क के स्कार्फ और तेल्बोट के बेल्बोतम पर
और इस बुलबुले से बाहर की दूनिया को देखकर
दिल पर कोइ चोट न लगती

स्वप्नदर्शी said...

"जैसे सहज रूप से बिल्‍ली का आकर दूध चट कर जाना।"

Is it so simple?
The history of animal domestication, and availability of milk in the kitchen and boundary lines between pets and wild?
Has this "sahajTaa" always existed?

अजित वडनेरकर said...

काफी समझदारी की बातें लिखी हैं। अच्छा यह भी लगा कि इन पंक्तियों में से नारीवाद छलांगे लगाता, सींग उठाए जख्मी करने को आमादा ....जैसा कुछ भी नहीं था।
समर्पण तो प्रेम का ही आयाम है।
सत्यं शिवम् सुंदरम्

Pankaj Upadhyay said...

अनुराग साहब से एकदम अग्री...’इन्सान’ लुप्त हो रहे है..ये प्रजाति भी पतन के कगार पर है..हम शेर बचा रहे है..कुछ इन्सान बचा लेते तो क्या दुनिया होती...

vivek said...

apke es article me bahut sari problems ke solution chipe hai,
sab-kuch bahut balance-

hayat le ke chaliye ,kaynat le ke chaliye ,
chalna hai to jamane ko sath le ke chaliye

aap yuhi chalte rahiye ......ab karwa to banna hi he .