Monday, 19 October 2009

स्‍वेटर बुनने वाले प्रोफेसर

ये जो किस्‍सा मैं सुनाने जा रही हूं, इसकी भूमिका सिर्फ इतनी ही है कि ये मेरी एक दोस्‍त अपरा ने कुछ दिनों पहले मुझे सुनाया था। दोस्‍त पुरानी है, इलाहाबाद के दिनों की और आजकल कनाडा में एक यूनिवर्सिटी से साइकोलॉजी में रिसर्च कर रही है। इससे ज्‍यादा पहचान नहीं बताऊंगी। उन लोगों की पहचान से ज्‍यादा जरूरी है यह बात, जो मैं कहने जा रही हूं।

अपरा को एक दिन उसके एक प्रोफेसर ने डिनर पर बुलाया। अपरा खुशी खुशी जा पहुंची। दरवाजे की घंटी बजाई। प्रोफेसर साहब ने दरवाजा खोला, बड़े जोशीले अंदाज में स्‍वागत किया। Welcome Apara, come come. फिर उन्‍होंने अपनी पत्‍नी को आवाज लगाई। Nikole, look who is here? फिर उन्‍होंने दोनों का आपस में परिचय कराया। दो मिनट वहां बैठने के बाद वे उठ खड़े हुए और बोले, Nikole, you talk to Apara and I go and cook meanwhile. अपरा निकोल से बात करने लगी। बीच-बीच में वो आते और पूछ जाते, Apra, are you comfortable ? Would you like to drink something? Tea, coffee, lassi? लस्‍सी? कनाडा में लस्‍सी सुनकर ही उसे थोड़ा आश्‍चर्य हुआ। लस्‍सी का लालच भी था और थोड़ा संकोच भी।

‘Sir, Lassi will take time.’

‘No, No, I make it in two minutes.’

और सचमुच दो की जगह पांच मिनट में प्रोफेसर साहब एक जग भरकर लस्‍सी लेकर हाजिर हो गए। आधे-पौने घंटे में खाना भी तैयार हो गया। दस-बारह तरह की अलग अलग डिश मेज पर सजा दी गई। इसके बाद उन्‍होंने अपनी बेटियों को आवाज दी। दो छोटी लड़कियां उछलते-कूदते खाने की मेज पर आ धमकीं। खाना सचमुच बहुत स्‍वादिष्‍ट था। अपरा ने मजे से खाया। अभी तक साइकोलॉजी पर उनसे डिसकस करके उनके ज्ञान के आगे नतमस्‍तक होने वाली अपरा उनकी पाक कला से भी अभिभूत थी। उस रात के डिनर में उनकी पत्‍नी निकोल की कोई भी भूमिका नहीं थी। इससे पहले कि हिंदुस्‍तानी लड़की एक सदमे से बाहर निकलती, प्रोफेसर ने उसे दूसरा झटका दिया। खाना खत्‍म होते ही वो बोले, Apara, would you like to have some Laddu? लड्डू? ये कहते हुए उन्‍होंने फ्रिज में से बेसन के लड्डुओं का एक डिब्‍बा निकाला और बोले, I have prepared this laddu at home. This time sugar is not proper but last time it was perfect.

बेसन के लड्डू अपरा के लिए दूसरा झटका थे।

फिलहाल रात बहुत हो गई थी। सो उन्‍होंने अपरा को रात वहीं रुक जाने के लिए कहा। उन्‍होंने उसे एक अलग कमरा दे दिया और वो तानकर सो गई।

अगले दिन सुबह जब अपरा की आंख खुली तो हल्‍के से खुले दरवाजे के बाहर दूसरे कमरे में उसे प्रोफेसर की पीठ नजर आई। वे बिस्‍तर पर दूसरी ओर मुंह करके बैठे थे। पीठ हल्‍की झुकी सी। कुछ कर रहे होंगे, सोचकर अपरा फिर तानकर सो गई। एक घंटे बाद फिर उसकी नींद खुली तो आंख मलते उसने देखा कि प्रोफेसर अब भी ठीक उसी मुद्रा में इस ओर पीठ किए बैठे थे। उसे जिज्ञासा हुई। ये कर क्‍या रहे हैं। वह कमरे से बाहर आई और मुंह धोने के बहाने उस ओर गई। फिर तो उसने जो देखा, वह चौबीस घंटे के अंदर तीसरा झटका था। प्रोफेसर साहब स्‍वेटर बुन रहे थे। वे अपनी छोटी बेटी के लिए एक प्‍यारा सा गुलाबी रंग का स्‍वेटर बना रहे थे। उन्‍होंने आधे से भी ज्‍यादा बुन डाला था।

मैं उन प्रोफेसर का नाम नहीं बताऊंगी। वो साइकॉलजी के क्षेत्र में दुनिया के बड़े नामों में से एक हैं। उनकी कई किताबें और शोध प्रबंध छप चुके हैं। उन्‍होंने कई साल जापान, अमेरिका और यूरोप के कुछ देशों में बिताए हैं। यूनिवर्सिटी में स्‍टूडेंट्स के चहेते हैं। उनके फेसबुक एकाउंट में मनोविज्ञान से जुड़े दिलचस्‍प शोधों और बातों के साथ-साथ किसी दिन उस गुलाबी स्‍वेटर की तस्‍वीर भी होती है, जो उन्‍होंने अपनी बेटी के लिए बुना है। किसी दिन निकोल के लिए बुने गए किसी स्‍कार्फ की, बड़ी बेटी के लाल मोजों की तो कभी बच्‍चों के लिए बनाई उनकी फेवरेट डिश की तस्‍वीर भी वहां देखी जा सकती है। पत्‍नी और बेटी ही नहीं, वो अपने प्‍यारे दोस्‍तों और स्‍टूडेंट्स को भी लाल स्‍कार्फ बुनकर बड़े प्‍यार से गिफ्ट देते हैं।

एक काल्‍पनिक टिप्‍पणी, जो सच है इन प्रोफेसर का किस्‍सा सुनने के बाद मेरी दादी-नानी की और आज (हालांकि वक्‍त काफी बदल चुका है और दुनिया अब ठीक वैसी ही नहीं रही जैसे मेरे बचपन में या मेरी मां और नानी के बचपन में हुआ करती थी) भी हिंदी प्रदेशों के कतई उंगलियों पर गिने जा सकने लायक परिवारों में यह टिप्‍पणी होती मर्दवा मेहरा बाटे। मेहरारू गोड़ पसारे बैठी रही अऊर चूल्हा-बासन करत रहा, सूटर बुनत रहा। मेहराइल आदमी है। ओकर बस चले तो बच्‍चौ धर ले पेट मा। दुनिया केहर जात बा। आदमी औरत जात का दाब के नाहीं रखी तो अइसने होई। आदमी के मेहरा बनाए देई औरत।


31 comments:

अम्बरीश अम्बुज said...

मर्दवा मेहरा बाटे। मेहरारू गोड़ पसारे बैठी रही अऊर ऊ चूल्‍हा-बासन करत रहा, सूटर बुनत रहा। मेहराइल आदमी है। ओकर बस चले तो बच्‍चौ धर ले पेट मा। दुनिया केहर जात बा। आदमी औरत जात का दाब के नाहीं रखी तो अइसने होई। आदमी के मेहरा बनाए देई औरत।
ha ha ha ha.. very true...

विनीत कुमार said...

मउगा वाला काम करे में केतना मजा आता है इ पढ़ल-लिखल अमदी के। भाड़ में जाय ऐसन पढ़ाय कि सब कुछ होवे के बाद कुछ खाय-पिए खातिर हाथ जरावे पड़े।..औ औरत के दीदा में एको रत्ती पानी नय कि सब टुकुर-टुकुर देखके भी कान बहीर-पीठ गहीड करके पड़ल रहे।..ये मेरी नानी कहती क्योंकि मेरे रसोई में घुसकर मां से बतियाने में ही,दीदी लोगों के बीच बैठकर खिस्सा-गलबात करने पर ही कहती है- कुछो कह तू सब,पढ़ला-लिखला के बाद भी मउगा जैसन लच्छन है एकरा...

विनीत उत्पल said...

बहुत खूब. मजा आ गया.

M VERMA said...

खूबसूरत स्वेटर
आकर्षक व्यक्तित्व
बहुत सुन्दर आलेख
दिलचस्प आलेख

Dipak 'Mashal' said...

achchha sansmaran hai....

निशांत said...

२५ साल पहले पिताजी की पोस्टिंग मनेन्द्रगढ़ (छत्तीसगढ़) में एक बैंक में थी. वहां एक सज्जन खाली समय में स्वेटर बुनते थे. आपकी पोस्ट पढ़के वह याद आ गया.

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

बहुत खूब, आपकी पोस्ट को आज फेसबुक में मेरे स्टेटस में लगा दिया है :-)

सागर said...

ये कहाँ आ गए हम... !!!!

कौना गाव है हो ?????

सागर said...

वैसे आपको उनका नाम बताना चाहिए था... कितने कम हैं ऐसे प्रोफेसर, है ना

PD said...

badhiya..
vaise ek bat bata dun.. sweater bunna mujhe bhi aata hai, aur silai kadhai karna bhi.. :)

poemsnpuja said...

बड़ा प्यारा किस्सा है...और ये टिपण्णी जो नहीं आई और भी मज़ेदार. रउआ ठीक कहत बानी...दुनिया केहर जात बा :)

ललित शर्मा said...

फ़ंदे डालना भी एक कला है, जो फ़ंदे डालना जानता है वही खोलने का मंत्र भी ढुंढ लेता है, यही सायकोलाजी है,यही प्रोफ़ेसर साहब कर रहे हैं, यदि हर आदमी ये काम सीख ले तो तीन फ़ायदे होंगे।
एक किसी के फ़ंदे मे नही फ़ंसेगा,दो स्वेटर तैयार हो जायेगी,तीन बीवी भी खुश-ठीक रही ना।

अर्शिया said...

प्रोफेसर साहब से मिलकर खुशी हुई।
( Treasurer-S. T. )

Archana said...

bbahut khub

अनिल कान्त : said...

Bahut Khoob !!

Arvind Mishra said...

इस पोस्ट का एक निहितार्थ यह भी है की पुरुष सब कामों में सहज ही सहज है !

Vivek Rastogi said...

हमने भी ऐसे कई लोग देखे हैं जो स्वेटर भी बुनते हैं और खाना बनाने में भी मास्टरी है।

क्रिएटिव मंच said...

बहुत सुन्दर आलेख
लेखन शैली बहुत आकर्षक है

शुभ कामनाएं

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क्रियेटिव मंच

अनुराग अन्वेषी said...

मनीषा जी, अर्से बाद मैं ब्लॉग देखने बैठा। अपने ब्लॉग पर आपकी नई पोस्ट की जानकारी मिली। वाकई खुशी हुई। खुशी की दो वजहें। एक तो यह पोस्ट अच्छी लगी, दूसरी वजह कि मेरे ब्लॉग पर आपके ब्लॉग का जो पंचलाइन है वह झूठा साबित हुआ। इस दूसरी बात की खुशी मुझे ज्यादा है। मैंने वहां पंचलाइन रखा था .इन दिनों डायरी से बेदखल. बहरहाल, उम्मीद है कि डायरी पर दखल बरकरार रहेगा।

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपको बतायें कि जब हम कक्षा 6 में थे तब हमने भी अपना स्वेटर बुना था। यहाँ आपके संस्मरण में एन साहब का काम करना जानना महत्वपूर्ण नहीं है महत्वपूर्ण यह है कि हम कब और कितना अपने परिवार को सहयोग दे रहे हैं। किसके सामने हम घरेलू काम कर रहे हैं।
आपके द्वारा रखा गया यह संस्मरण उन लोगों की आँखें खोलने के लिए शायद पर्याप्त है जो बात-बेबात अपने घर की महिलाओं को मात्र काम वाली समझते रहते हैं। बधाई

शरद कोकास said...

प्रोफेसर साहब के बारे में यह जानकर अच्छा लगा लेकिन यह सच है कि नानी दादी ही नहीं हमारे यहाँ के पुरुष भी यही कमेंट करेंगे इसलिये कि वे भी उन्ही नानी दादियो और नाना दादाओं के पोते हैं । सायास यदि कोई चाहे तो इन परम्पराओं से मुक्ति पा सकता है अन्यथा यह दुनिया ऐसे ही चलती रहेगी । फिर भी इस कोंचने वाले संस्मरण के लिये धन्यवाद ।
@निशांत बैंक मे स्वेटर बुनने वाले उन सज्जन के बारे मे मैने भी सुना है । ऐसे ही लोगों के कारण आज काम का यह आलम है कि बैंक से घर लौटकर थकावट के कारण पुरुष अपने हाथ से पानी भी लेकर पी नहीं सकते लेकिन वहीं बैंक मे काम करने वाली स्त्रियाँ सुबह पूरा खाना बनाकर जाती हैं और घर लौटकर पूरा खाना बनाती हैं ।धन्य है वे ।

Mired Mirage said...

मनीषा, प्रोफ़ैसर साहब से मिलवाने के लिए आभार। शायद वे मनोविज्ञान को सही समझ गए। जो आंतरिक शांति हाथ का काम करने से मिलती है वह किसी अन्य काम से नहीं। गाँधी जी का चरखा चलाना हो, स्त्रियों द्वारा कढ़ाई, बुनाई, सिलाई, ये सब काम मन को बहुत शान्त कर देते हैं। शान्ति की आवश्यकता पुरुषों को स्त्रियों से कम नहीं है।
घुघूती बासूती

अर्कजेश said...

पॉवर की प्रॉब्लम !

डॉ .अनुराग said...

..यूं भी कहा जाता है १४४ आई क्यू वाले दुनिया की बंधी बंधाई परिपाटी पे नहीं चलते .....हमारा वास्ता एक दो से पड़ा है .स्वेटर तो नहीं बुनते थे ...पर हां एक दो अजब काम जरूर करते थे

अभिषेक ओझा said...

वाह ! अच्छा लगा इनसे मिलकर. ये फिरंगी प्रोफेसर होते ही ऐसे हैं :)

Udan Tashtari said...

स्वेटर वाली बात छोड़ दो तो हमारे लिए भी यही कहना: आदमी के मेहरा बनाए देई औरत...हा हा!! कनाडा भी लागू है हम पर.. :)

शोभना चौरे said...

hamne kam ke vargikarn kar diye hai jisse ham apne aap ko alg nhi kar pate \
badhiya post

ASHISH said...

Sweater bun na to nahin, haan khana banana main bhi janta hu. Bahut khoobsoorti se likha gaya hai!
Ashish
www.myexperimentswithloveandlife.blogspot.com

Manish Kumar said...

पाक कला में सिद्धस्त तो कई महानुभावों को देखा पर स्वेटर बुनने की बात तो यहीं सुनी। बाकी आपकी काल्पनिक टिप्पणी ने हँसने पर मजबूर कर दिया।

इलाहाबादी अडडा said...

मनीषा जी, आपके ब्‍लाग में पहली बार आया लेकिन पहली बार में ही तबियत खुश हो गयी। इसमें भी प्रोफेसर साहब वाला किस्‍सा तो सचमुच लाजवाब है। आप तो इलाहाबाद में पढी हैं इसलिए आपको शायद मालूम हो कि खुद आपके इसी विश्‍वविद्यालय के एक नहीं बल्कि तीन प्रोफसर इन्‍हीं प्रोफसर साहब के अंदाज के हैं लेकिन उनकी लोकप्रियता के बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता । अगर आपको न मालूम हो तो अपने साथियों से पूछिये शायद वे बता सकें।
लेकिन आपकी पोस्‍ट सुन्‍दर रही।

Kishore Choudhary said...

किस्सा भी कहें इसे तो ये रोचक होने के साथ कई बारीक प्रश्न उठाता है, आपने जिस सादगी से बात कही है वह मुझे उतनी ही जटिलता से अपने भंवर में खींच ले गयी है. ज़िन्दगी के प्रति अपने बर्ताव के सारे कारण हम अक्सर बाहर से उठा लाते हैं. हमारी अपनी निर्धारित की हुई चीजें ज़िन्दगी में कम ही होती है. प्रोफेसर ने अपनी ज़िन्दगी को खुद के लिए बिताने का निश्चय किया हुआ लग रहा है जैसा कि एक आम आदमी नहीं कर सकता वह हमेशा लीक पर चलता है और परिपाटी का पोषण करता है. आपको फिर से आभार कहने का मन है मैंने कल पूरा काम किया है घर का, मुश्किल तो बहुत है पर आनंद उससे भी अधिक है.