Wednesday, 7 October 2009

एक दिन


पठानकोट से जाती है जो गाड़ी

कन्‍याकुमारी को

सोचा था एक दिन उस पर बैठूंगी

इस छोर से उस छोर तक

कन्‍याकुमारी से सियालदाह

सियालदाह से जामनगर

जामनगर से मुंबई

मुंबई से केरल

वहां से फिर कोई और गाड़ी

जो धरती के किसी भी कोने पर लेकर जाती हो

टॉय टेन पर कालका से शिमला

दिसंबर की किसी कड़कती दोपहरी में जाऊंगी

जब चीड़ की नुकीले दरख्‍तों पर

बर्फ सुस्ता रही होगी

पहाड़ों और जंगलों से गुजरेगी गाड़ी

पहाड़ी नदी के साथ-साथ चलेगी

ज्‍यादा दूर नहीं तो कम कम से

अपने पूरे शहर का चक्‍कर

तो लगाऊंगी ही एक दिन

अपनी साइकिल पर

पीठ पर एक टेंट लादकर

उस गांव में जाऊंगी

जहां से हिमालय को छूकर देख सकूं

वहीं पड़ी रहूंगी कई दिन, कई रातें

नर्मदा में तैरूंगी तब

जब सबसे ऊंचा होगा उसका पानी

सोचा तो बहुत

इस सूनसान अकेले कमरे में लेटी

बेजार छत को तकती

आज भी सोचा करती हूं

धरती के दूसरे छोर के बारे में

जहां रात के अंधेरे में

अचानक बसंती फूल खिल आया है

जहां कोई दिन-रात

मेरी राह अगोर रहा है

14 comments:

कुश said...

फेन... टास... टिक..!! बस यही कहूँगा

हिमांशु । Himanshu said...

बेहद खूबसूरत ! धन्यवाद ।

सागर said...

आपने कालका-शिमला एक्सप्रेस An Exquisite Journey देखि है ?

अनिल कान्त : said...

superb !!
Kya Khayalat hain
waah !!

raj said...

इस सूनसान अकेले कमरे में लेटी

बेजार छत को तकती

आज भी सोचा करती हूं

धरती के दूसरे छोर के बारे में ...chhoo lun himalaya or tair lun narmada me...kitni khwahishe hai is chhoti se zindgee me...

ओम आर्य said...

जहां रात के अंधेरे में

अचानक बसंती फूल खिल आया है

जहां कोई दिन-रात

मेरी राह अगोर रहा है
waakai kitane khubsoorat hai khwaab ......kash yah hakikat hote ......koi sirf our sirf mera hota our bat johata ......dil ko chhoo gayi .........

सुशील कुमार छौक्कर said...

बहुत खूब। गजब के ख्याल।

पवन *चंदन* said...

वाह वाह एक बेहतरीन रचना है
अच्‍छा लिखा है
अगली रचना का इंतजार रहेगा

डॉ .अनुराग said...

फिलहाल यूं करिए वक़्त मिलते ही अपनी साईकिल की सर्विस करा लीजिये...

अजित वडनेरकर said...

दिल्ली कहां है इसमे:)

बढ़िया है जी...

Manish Kumar said...

दौड़ती भागती ज़िंदगी में प्रकृति की गोद में भटकने का मन तो करता ही है। मुसाफ़िरी का ये जज़्बा बना रहे।

rakesh said...

Narmada to ab bhi tumhara intezar kar rahi hai... Tumhi ne duri bana li to koi kya kare???
Es list me sab to nahi, lekin kuchh thikane jyada dur nahi hai, tay karo to jab chahe haath badhakar paa sakti ho...

प्रकाश बादल said...

दूसरा कोना...........कोई राह..........अगोर रहा है.............अच्छा अच्छा समझ गया। बहुत खूब कविता बहुत अच्छी है!

poemsnpuja said...

यायावरी के ऐसे ख्वाब हम भी बुनते हैं...आपका यूँ भटकना बेहद रास आया हमें