Thursday, 18 February 2010

मेरी जिंदगी में किताबें - 2

छुटपन से ही पापा तरह-तरह की किताबें लाकर मुझे देते थे। उनमें लिखी कहानियां मैंने सैकड़ों बार पढ़ी थीं। रोम का वह दास, जिसे भूखे शेर के सामने छोड़ दिया गया था और शेर उसे खाने के बजाय उसके पैरों के पास बैठकर उसके तलवे चाटने लगा था, क्‍योंकि बहुत साल पहले जब वो शेर घायल था, एंड्रोक्‍लीज ने उसके पैरों में से कांटा निकाला था। शेर ने उसे नहीं खाया। वो कहानी मैं रोज एक बार जरूर पढ़ती थी।

पापा के पास रूसी कहानियों की एक किताब थी। एक किताब धरती और आकाश के बारे में थी, जिसमें जर्दानो ब्रूनो, कोपरनिकस और गैलीलियो की कहानियां थीं। जर्दानो ब्रूनो को लंबे-लंबे चोगे पहने और हाथों में क्रॉस लिए पादरियों ने इसलिए जिंदा जला दिया था क्‍योंकि वो कहता था कि अंतरिक्ष का केंद्र पृथ्‍वी नहीं सूर्य है। किताब में लिखा था कि ब्रूनो बाइबिल के खिलाफ बोलता था। मैंने बाइबिल नहीं पढ़ी थी, लेकिन दस साल की उमर में ब्रूनो की कहानी पढ़ने के बाद ही मैंने जाना कि धर्म और मुल्‍कों की सत्‍ताओं पर बैठे लोगों के साथ कितने बेगुनाहों के खून से रंगे थे। उन्‍हीं के कारण कोपरनिकस ने कभी वो नहीं कहा, जो उसे लगता था कि सच है और गैलीलियो ने डरकर माफी मांग ली थी, लेकिन फिर भी उन लोगों ने उसे जेल में डाल दिया था। पापा के पास और भी बहुत सारी कहानियां थीं।


मैं उन कहानियों के साथ बड़ी हुई, जिनमें लिखी हुई हर बात जिंदगी की असल किताब में गलत साबित होने वाली थी, फिर भी उन कहानियों पर मेरा विश्‍वास आज भी कायम है। असल जिंदगी में कॉरपोरेटों में बैठा शेर एंड्रोक्‍लीजों को भी खा जाता है। फिर भी मैं चाहूंगी कि मेरा बच्‍चा एंड्रोक्‍लीज की कहानी पढ़कर बड़ा हो और वो एंड्रोक्‍लीज पर भरोसा करे।

किताबें पापा की सबसे अच्‍छी दोस्‍त थीं। वो कहते थे कि उत्‍तर प्रदेश के जिला प्रतापगढ़ के जिस छोटे से गांव में वो पैदा हुए थे, वहां से होकर उनके बेहतर इंसान बनने का सारा सफर इन्‍हीं किताबों से होकर गुजरा था। मुझे भी एक बेहतर इंसान बनना था, इसलिए मैंने उन किताबों को हमेशा अपने पास संभालकर रखा, जिन्‍होंने सबसे कमजोर और अवसाद के क्षणों में हमेशा मेरा साथ निभाया। उन किताबों को हमेशा ऐसे सहलाया, दुलराया और अपनी छाती से लगाया, मानो वही मेरी प्रेमी हों। वही मुझे संसार के सब गूढ़, अजाने इलाकों तक लेकर जाएंगी, सृष्टि के अभेद्य रहस्‍यों का भेद खोलेंगी। वो मुझे ऐसे प्रेम करेंगी, जैसा प्रेम के बारे में मैंने सिर्फ किताबों में पढ़ा था।

कभी साहित्‍य और राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले शहर इलाहाबाद के ऑक्‍सफोर्ड में जहां मैंने बीए तक पढ़ाई की, वहां तब तक पढ़ने-लिखने का कुछ संस्‍कार बाकी था। जिनके भी साथ मेरी दांत कटी यारी थी, वो सब किताबों से वैसे ही मुहब्‍बत करते थे। कोई अंबानी नहीं था और न शहर में कॉरपोरेट का व्‍यापार था। हमारी जेबें खाली होती थीं, लेकिन ट्यूशन, आकाशवाणी या अखबार में कोई छोटा-मोटा लेख लिख देने से जो भी मामूली सी रकम हाथ में आती, उसे बचा-बचाकर हम किताबें खरीदते थे। दस लोग मिलकर एक छोटी सी लाइब्रेरी बना लेते और आपस में मिल-बांटकर किताबें पढ़ते। हालांकि उस पढ़ने का संसार भी बहुत सीमित था। ज्‍यादातर पार्टियों की बुकलेट्स, प्रगति और रादुगा प्रकाशन के भीमकाय उपन्‍यास और मार्क्‍सवाद क्‍या है, दर्शन क्‍या है, भौतिकवाद क्‍या है, आदि-आदि के बारे में छोटी-छोटी पुस्तिकाएं होती थीं। तब पढ़ने का ऐसा भूत था कि हाथ लगा कोई लिखा शब्‍द अनपढ़ा नहीं रहता था। और तो और, आज जिस अखबार को मुंह उठाकर भी नहीं देखती, तब अमर उजाला के एडीटोरियल तक छान जाया करती थी। आज जब पढ़ने को इतना अथाह मेरे अपने घर में है और पढ़ने का वक्‍त नहीं है, सोचती हूं ये किताबें उस उम्र में मिली होतीं तो?


लेकिन वक्‍त इस तेजी से गुजरा है और उसने ऐसे मेरे हमसफरों की शक्‍लें बदल दी हैं कि दस साल पहले का उनका ही रूप उनके सामने रख दिया जाए तो शायद उन्‍हें यकीन न हो कि ये वही हैं। जब हम पढ़ रहे थे, किसी को आभास तक नहीं था कि अचानक इस देश की इकोनॉमी का चेहरा इतने वीभत्‍स अनुरागी ढंग से बदल जाएगा। पत्रकारिता तब कोई ऐसा ग्‍लैमरस पेशा नहीं था, और न ही उसमें यूं नोटों की बरसात होती थी। तब इलाहाबाद शहर में 10-10 रुपए जोड़कर सतह से उठता आदमी और कितनी नावों में कितनी बार खरीदने वालों को पता नहीं था कि सिर्फ दस साल के भीतर वो देश की राजधानी में ऐसी अकल्‍पनीय तंख्‍वाहों पर ऐसी आलीशान जिंदगियां जी रहे होंगे, जो उनके छोटे से शहर और घर में दूर की कौड़ी थी।


कितनी आसानी से किसी को सबकुछ देकर उसका सबकुछ छीना जा सकता है और वो उफ तक नहीं करेगा, उल्‍टे इस छीन जाने के बदले आपका एहसानमंद होगा। इलाहाबाद के वो साथी आज भी दिल्‍ली के पुस्‍तक मेलों में परिवार के साथ घूमते हुए मिल जाते हैं और आज जब किताबें न खरीद पाने की कोई मुनासिब वजह नहीं है, कोई किताब नहीं खरीदता। मोटी तंख्‍वाहें घर और गाड़ी के लिए लोन देने वाले बैंक उठा ले जाते हैं और जो बचता है, वो मॉलों और गाड़ी के पेट्रोल में खत्‍म हो जाता है। बचता आज भी कुछ नहीं। आज भी व़ो वैसे ही फोकटिया हैं, जैसे इलाहाबाद में हुआ करते थे। ये पैसा बस अपर क्‍लास हो जाने के एहसास की तरह उनके दिलों में बसता है। पहले वे जानते थे, अब नहीं जानते कि वे किस वर्ग के हिस्‍से हैं।

जारी

पहली किस्‍त - मेरी जिंदगी में किताबें

18 comments:

डिम्पल said...

kitabo se apka pyaar mujhe apke blog pe kheench lata hai.ye aap me mujhpe ik kadhi hai ya common baat hai...

प्रकाश बादल said...

किताबें हमें बहुत कुछ दिखाती है और बहुत कुछ सिखाती है लेकिन हमने देखना और सीखना दोनों से नाता तोड़ दिया है। लेकिन आपका किताबों के प्रति मोह आपके व्यक्तित्व में झलकता है आपने अनुभवों की नब्ज़ टटोली है इसलिए आप में गंभीरता और चिंतन दोनों झलकते हैं।

शरद कोकास said...

मनीषा , आपको पता है ..एक ही तरह के लोग अलग अलग शहरों मे एक साथ इसी तरह एक जैसी किताबों के दोस्त होते हैं । यही सब हम दोस्त यहाँ दुर्ग भिलाई में भी करते थे । पी पी एह की एक बड़ी सी वैन आती थी जिसमे किताबें ही किताबें होती थीं हम लोग रोज वहीं शाम बिताया करते थे । जब जबलपुर जाते थे तो वहाँ तुलाराम चौक पर एक कॉमरेड त्रिलोक सिंह की दुकान थी वहाँ से किताबे खरीदते थे ,और साहित्यिक कार्यक्रमों मे जैसे ही समय मिलता स्टाल पर टूट पड़ते । अब भी यह सिलसिला जारी है । हाँ यह सच हैकि अब पढने का समय कुछ कम मिलता है ।और हमारे साथ कुछ लोग ऐसे भी थे जो हमारे पढ़ने का मज़ाक उड-आते थे ..वे आज अफसोस करते हैं ,,वे तब पढ़ते नहीं थे आज पढ़ नहीं सकते । यह उनका स्थायी नुकसान है । यह पोस्ट ब्लॉग जगत के लोगों के लिये एक महत्वपूर्ण सन्देश की तरह है ।

बी एस पाबला said...

आपके पापा की किताबों से दीवानगी के किस्सों से पता नहीं क्यों मुझे अनजाना सा डर लगने लगा है

कारण पहले किसी टिप्पणी में लिख चुका

बी एस पाबला

mukti said...

हैलो मनीषा, पता नहीं तुमने पहचाना कि नहीं. मैं अक्सर तुम्हारे ब्लॉग पर आती हूँ और चुपके से पढ़कर चली जाती हूँ. आज पहली बार टिप्पणी कर रही हूँ. तुम्हारी ज़िंदगी के अनुभवों को तुम्हारी ही कलम से जानना और महसूस करना अच्छा लगता है. हम सभी जो ज़िंदगी जी रहे हैं, सबसे बड़ी बात है कि उसे हमने खुद चुना है. बस... यही काफ़ी है. किताबें तब भी हमारे साथ थीं और अब भी हैं. जिन्होंने उनका साथ छोड़ दिया उनके बारे में क्या कहना?

Udan Tashtari said...

किताबों के बहाने ही, बड़ी गंभीर बात कह दी आपने.

Sanjeet Tripathi said...

अकाट्य।
कहीं न कहीं किताबें हमारे अंदर का आईना हैं।
याद है मुझे ,कई किताबें अपनी उम्र से पहले पढ़ने के लिए डांट खाना। या कभी किसी के कमरे से किताबें उठा ला कर पढ़ने के लिए।

आपके इस विषय क्रम के साथ मैं भी बहुत सी बातें याद कर रहा हूं

श्रुति अग्रवाल said...

किताबों में गुम...कैसी हो मनीषा। इस बार कितनी किताबों को जोड़ा अपने जखीरे में। बाकी भोपाल में मन रम गया लगता है। यार ब्लाग लगातार लिखा करो वरना अखबार में तुम्हारी कलम में जंग लग जाएगी...न्यूज, अखबार हम जैसों क लिए है और खुद की कोई किताब लिखना शुरू की या नहीं।

अनिल कान्त : said...

आपकी लिखी अंतिम पंक्तियाँ एक कड़वा सच बयाँ करती हैं....यही तो हाल है आज के समय का...

एक समय में फिर सिर्फ़ मोटी तनख़्वाह दिखती भले हो लेकिन पास कुछ नही होता...बस एक एहसास भर रहता है कि हम अपर क्लास में हैं

डॉ .अनुराग said...

सारी कवायद इस जमीर को कहाँ तक स्ट्रेच करे ...इसकी ही है .....

शब्द-निधि said...

kitaabe hamari dost hoti he.anjaane hi ye hamaaare vyktitv ka aainaa ban jaati he.ya hum kah sakte he ki hum jo bhi padte he usase hi hamara charitra nirmaan hota he. mene abhi abhi blog ki duniya me kadam rakha he par jitani bhi baar blog apde he aapko avshya pada he aaj apni pratikriya dene se apne aap ko rok nahi paayi.

शब्द-निधि said...

kitaabe hamari dost hoti he.anjaane hi ye hamaaare vyktitv ka aainaa ban jaati he.ya hum kah sakte he ki hum jo bhi padte he usase hi hamara charitra nirmaan hota he. mene abhi abhi blog ki duniya me kadam rakha he par jitani bhi baar blog apde he aapko avshya pada he aaj apni pratikriya dene se apne aap ko rok nahi paayi.

शब्द-निधि said...

kitaabe hamari abse achchhi dost hoti he.hum jo bhi padate he vahi hamare charitra nirmaan me sahaayak hota he .mene abhi abhi blog ki duniya me kadam rakha he aapke blog hamesha padti hu.aaj comment karne se apne aap ko rok nahi saki .

अशोक कुमार पाण्डेय said...

सच में जलन हो रही है आपसे। हमें बचपन में वही गीताप्रेस की किताबें मिली। नाना के यहां गर्मियों की छुट्टियों में सारिका, धर्मयुग और दूसरी किताबें पूरी-पूरी दोपहरी पढ़ा करता था। इण्टर में कुछ और किताबें मिली पर शौक पूरा हुआ जब बीए के लिये गोरखपुर पहुंचा। विषय था अर्थशास्त्र, गणित और सांख्यिकी पर पूरे दिन और अक्सर रात भी पढ़ता था साहित्य,इतिहास,राजनीति और दर्शन। ट्यूशन पढ़ाये ही सिगरेट और किताबों के लिये…
हां वर्ग वाला सवाल आपने ख़ूब उठाया। वाकई इन तथाकथित उच्च आय वाली नौकरियों ने तमाम दूसरी चीज़ों के साथ वर्गबोध भी छीन लिया है।

विजयप्रकाश said...

कितनी आसानी से किसी को सबकुछ देकर उसका सबकुछ छीना जा सकता है-आज के मध्य-वर्ग की बारे में बहुत गहरी, अर्थपूर्ण बात लिख दी आपने.

Chandratal se Apratyaksha said...

15 miles the milestone!
And Manisha!
We are looking for a location to shoot the telefilm 'milestone' written by JAYA SNOWA. A member of Unit asked me to see your Blog.
I congratulate U for your energy of expression. Wonderful!
But I want to tell somthing else.
There is the same Girl, I have found in Jaya's Story and Snowa Borno's Blog. This Girl is crying continueously for her World in different words and with her hidden tears.
We want to find out our real life
and our real 'HE'.
Varna 'Ye duniya agar mil bhi jaye to kya hai?'
Manisha, We all love your struggle and thirst. Kindly make it more deeper and VISFOTAK.

himanshu said...

Zindagi bhale kabhi nostelgia lagane lage, padhayi ko kabhi nahin hone dena chahiye. Wahi agar barkarar rakhi ja saki, to phir bar-bar jhatake khati is zindagi ko sambhalane aur sawanrane se kaun rok sakata hai!

Pankaj Upadhyay said...

बहुत कुछ अपने जैसी कहानी है..बहुत कुछ..
लेकिन हमे तो प्यार हो गया था..’सुधा’ से ’गुनाहो का देवता’ वाली...फ़िर ’शशि’से हुआ जब शेखर एक जीवनी पढ रहा था...

फ़िर सलमान रश्दी का सलीम..आजकल तसलीमा नसरीन की ’फ़्रेन्च लवर’ पढ रहा हू..जब बेस्ट बस ट्रैफ़िक मे होती है, हम ’नीला’ के साथ होते है :)

अच्छा लगा आपको जानकर..