Wednesday, 24 February 2010

देखी है कोई बोहेमियन औरत ?

हम कौन हैं? हम क्‍यों हैं? क्‍या है हमारे होने का मतलब? हम क्‍यों होना चाहते हैं? क्‍यों होना चाहिए हमें? जो न हों तो किसका क्‍या बिगड़ता है? क्‍या आता है, क्‍या चला जाता है? हमारा ये होना हमारे लिए है या कि किसके लिए? इस सृष्टि के एक कण से बनी मैं, मेरे होने का मतलब क्‍या है? क्‍या पता है मुझे? क्‍या चाहती हूं अपनी जिंदगी से? ये जो हम हैं इस सृष्टि में, क्‍यों?

मैं क्‍या होना चाहती हूं? जानती हूं क्‍या? कहने को तो जो यह बीहड़ लड़ाई का मैदान है, ये जिंदगी, इसमें हम सब अपने होने और न होने के साथ होते हैं, बिल्‍कुल अकेले। अकेले जरूर होते हैं, पर अपने में नहीं होते। अपने मन, अपनी आत्‍मा में अवस्थित नहीं होते। अकेले होकर भी हम क्‍या और कैसे होंगे, शायद उसके पहले से बने हुए कुछ तयशुदा रास्‍ते हैं, जिन पर चलना होता है। एक अजीब, अंधेरी सरपट दौड़ है, जिसमें भागे जाते हैं सब। सबको कहीं पहुंचना है। कहां? कोई नहीं जानता, लेकिन सब भागे जाते हैं? शायद ही कभी रुककर, थमकर, ठहरकर सोचते हों कि जा कहां रहे हैं? और इसी राह पर क्‍यों? किसी और राह क्‍यों नहीं? क्‍या किसी ने बताया या कि किसी किताब में पढ़ा कि इसी राह दौड़े जाना है? पर नहीं, दौड़े जाते हैं।

मैं सोचती हूं कभी और पूछती हूं कभी-कभी अपने आपसे कि मैं क्‍या होना चाहती हूं? किसी अखबार की एडीटर या कि कोई बड़ी तोप तुर्रम जंग रिपोर्टर? जिस राह निकल जाऊं तो लोग फलां स्‍टोरी में तो आपने क्‍या कमाल किया था या ढंका रिपोर्ट में क्‍या अद्भुत समझ और गहराई थी का भोंपू उठाए मेरे पीछे-पीछे आएं। क्‍या मैं एक बेहद सजीले, रंगीले, सुरीले और मोहब्‍बत के झूले पर ऊंची-ऊंची पेंगे बढ़ाने वाला नौजवान के इश्‍क में गिरफ्तार होना चाहती हूं? मैं चाहती हूं क्‍या कि दो सुंदर-सुंदर गोल-मटोल मीठे झबरीले बच्‍चे मां-मां करते मेरी साड़ी खींचे और कहीं से दौड़ते हुए आकर मेरे पैरों से लिपट जाएं, जब मैं रसोई में उनके मनपसंद रसगुल्‍ले बना रही होऊं? बड़े लाड़ से मेरी गोदी में चढ़कर कढ़ाही में झांकें कि मां, क्‍या पका रही हो? मैं गोदी से नीचे उतार दूं तो भी साड़ी में मेरे खुले पेट से मुंह चिपकाकर हवा निकालें और अजीब सी आवाजें करें?

एक आधुनिक या तेजी से आधुनिकता की राह पर कदम बढ़ाते शहर में दो कमरों का एक सुंदर, सलोना घर हो? एक अच्‍छी सुखी-सी दिखने वाली गृहस्‍थी? दुनिया ये जाने और हम भी ये मानें कि इस घर में प्‍यार बसता है। एक जॉइंट बैंक एकाउंट हो, जो जिंदगियों के साझे होने का सांसारिक, सामाजिक सर्टिफिकेट हो। रिश्‍तों में प्‍यार और गरमाहट का बोध कराता एक सुकूनदेह बिस्‍तर। आंखों में ढेर सारा लाड़ समोए बांहों में उठा लेता पति, गुल मचाते बच्‍चे? बेशक, किताबों की एक आलमारी भी, जिसमें करीने से सजे हों रिल्‍के, विक्‍टर ह्यूगो, शॉपेरहावर, मिल्‍टन, नेरुदा, वॉल्‍ट व्हिटमैन।

क्‍या जिंदगी की ये इमेजेज मेरे बहुत अपने अंतरतम से उपजी, मेरी अपनी रची, चाही और मांगी हुई ऑरिजनल इमेजेज हैं? या कोई और ताकत बैठी रही है मेरे अवचेतन में, जो बताती है कि एक सुंदर, सुखी जीवन की इमेजेज ऐसी होती हैं? देखो ये सपने, क्‍योंकि ये किसी भी लड़की द्वारा देखे जाने वाले सबसे सुंदर, मोहक सपने हैं?

कौन हूं मैं? क्‍या चाहती हूं?

जारी

32 comments:

venus kesari said...

पोस्ट पढ़ कर मुझे लगा की ये सारे सवाल आपके खुद से हैं और उत्तर आपको खुद को देना है

बस यही कहना था

prabhat gopal said...

आपका पढ़ा हर बार कुछ कह जाता है। थोड़ा दर्शन लिये हुए है।

Pankaj Upadhyay said...

ह्म्म... सेन्टियाना बुरी बीमारी है, बचे उससे..

ये सवाल हमने न जाने कितनी बार अपने आप से पूछे, चलते हुए लोगो की शक्लो मे झाकते थे, ढूढ्ते थे कि ये क्या चाह रहे है..कभी कभी लगा कि वो लोग भी शायद मुझमे वही सब ढूढ रहे है...

हमारे शहर की सिविल कोर्ट मे दो अजीब इन्सान अपनी दुकान लगाते थे..एक चादर ओढ्कर लेट जाता था और दूसरा उससे वहा बैठे लोगो के बारे मे पूछता था..वो न जाने कैसे सबके बारे मे सच बताता था..मेरी भी बडी तमन्ना थी कि अपनी ज़िन्दगी की किताब के आखिरी पन्ने खुलवा लू उससे..कभी कर नही पाया ..ऐसी ही काफ़ी चीजे नही कर पाया हू...

कभी कभी जिप्सी बन जाना चाहता हू और बस जाना चाहता हू बनारस के घाटो पर..’ची’ की तरह ही शायद, उठाना चाहता हू पिता जी की वो पुरानी साईकिल जो मेरी वजह से चोरी हो गयी थी, और घूमना चाहता हू पूरा भारत...खुद को ज्यादा समझ नही पाया इसलिये सबको समझना चाहता हू..इस ’इन्सान’ की किस्म को जानना चाहता हू..ढूढना चाहता हू कितने बचे है..

लेकिन कभी कभी हम वही लाइफ़ जीते है जो हम नही जीना चाहते..’मिसफ़िट’ का मतलब भी वही है शायद!! वो आप कहती है न कि जीरो बढते जाते है और किताबे कम...

अभिषेक आनंद said...

बहुत दिनों के बाद किसी को इतने सरल और सुलझे ढंग से अपने विचारों को व्यक्त करते देखा. आपकी पिछली पोस्ट भी पढ़ी थी और इश्किया और थ्री इडियट्स के बारे में आपके विचार पढ़े.
अच्छा लगा. लगा कि किसी ने तो थ्री इडियट्स के मसाला और इश्किया के गंभीरता को समझा. ये भी सच है कि अभी हमारा सिनेमा इतना विकसित नहीं हुआ है कि कैमरा की लेंस जीवन के गुधातम सच को समझ सके. और जहाँ तक खुद को समझने की बात है तो मुझे तो लगता है कि सामने वालों को समझने से ज्यादा मुश्किल है खुद को समझाना क्योंकि हम खुद की जटिलता को किसी दुसरे की अपेक्षा ज्यादा अछे तरीके से जानते है. जटिलताओं के बीच सरलता को निकलना बहुत मुश्किल होता है.

Rajesh Srivastavaa said...

wow! I think majority of the happy life "images" comes from what we see around us and what we perceive about a 'perfect life' as well at times what we miss in our life. Hope you find the real source of these "happy" images (yeah find the real culprit and let me know, I am gonna beat the heck out it). Kripya jaari rakhen (as in next episode).

श्रुति अग्रवाल said...

एक लड़की की संपूर्णता। कैरियर और परिवार का अद्भुत तालमेल। दो मासूम आँखों का भोर में देखा सपना। मोहक खुशबू में लिपटा दुनियादारी के लाख लिहाफों में छिपाया हुआ प्यार की स्याही से सिमटा खत। एक ऐसा सपना जिसके सच होने का इंतजार हम ताउम्र करते हैं और हाँ सपने सच होते हैं। यूँ ही रोज कलम घसीटती रहो...मैं पढ़ती रहूँगीं।

शशिभूषण said...

मनीषा जी,बहुत अच्छा लगा पढ़कर.सुबह-सुबह मन खुश हो गया.सो प्रतिक्रिया कविता जैसी हो गयी.

हम ज़िंदगी से क्या चाहते हैं?
मेरा भी सवाल होता है खुद से अक्सर
मेरा मैं जिसके बारे में मुझे पता नहीं कौन है?
जो सवाल पूछता है या जो जवाब दे लेता है
कहता रहा है गहरी सांस भरकर
हम थोड़ा-मोड़ा नहीं
सबकुछ चाहते हैं.
लंबी ज़िंदगी
कभी खतम न होनेवाला सुख
अमर औलाद
कभी बूढ़े न होनेवाले नीरोग मां-बाप
अंतहीन सफलताएँ
हमेशा हार जानेवाले दुश्मन
संसार जितनी बड़ी दोस्ती
ईमानदार अनुयायी
कभी कम न होनेवाला सच्चा प्यार
सुंदर दाम्पत्य
बादशाहत
फकीरी
अमर औलाद
कभी बूढ़े न होनेवाले नीरोग मां-बाप
संसार जितनी बड़ी दोस्ती
सबकुछ
मेरा मतलब है सबकुछ प्यारे
जब हम खुद से पूछते हैं कि हम क्या चाहते हैं
तो सच यह होता है
कोई कटौती हो रही होती है हमारी ज़िंदगी में.

Suman said...

nice

अनिल कान्त : said...

एक इंसान के अंदर कई इंसान बसते हैं...एक कुछ चाहता है तो दूसरा कुछ और

ravi pandey said...

A dream by a commoner woman ,an ultimate desire perhaps after acheiving this the world will stop for her , it is not so that no woman reaches to above satisfaction but this is not sustainable because life is not stationary it is dynamic and full of momentum.
kEEP WRITING

RAVI SRIVASTAVA

डॉ .अनुराग said...

गोया के हर उम्र का आसमान जुदा होता है...२० की उम्र का....३५ में नहीं रह जाता ....ऐसे थोट मुए बड़े परेशां करते है ...
The best way out is always through....

डॉ .अनुराग said...

गोया के हर उम्र का आसमान जुदा होता है...२० की उम्र का....३५ में नहीं रह जाता ....ऐसे थोट मुए बड़े परेशां करते है ...
The best way out is always through....

अजीत 'फिरदौस' said...

जिंदगी में ऐसे मौके शायद कम ही होते हैं जब खुदके भीतर झांकने का मौका मिलता है..दुनियावी रंगमंच पर खुद के मायने तलाशने की कवायद होते हैं ऐसे पल..आपने इस अंतर्द्वंद को बखूबी उकेरा है..लेख सुखी जीवन को ज्यादा परिभाषित करता है ना कि संतुष्ट जीवन को..संतुष्टि तब आती है जब खुद में ये लगता है हाँ इस रंगमंच पर आपने अपने चरित्र को बखूबी जिया है..थोडा सा उपदेशात्मक जो कि नहीं है..है तो बस खुद में झाँकने की गुजारिश..और वो भी आपके पिछले लेख से उधार ली गयी पंक्तियों के माध्यम से .....
ब्लॉग की थोड़ी समझ और तमीज आने और इस माध्‍यम की ऐसी अनोखी कलाकारी, इतना ताकतवर इस्‍तेमाल देखने के बाद लगता है कि ब्लॉग सिर्फ एक चोट खाए, पिछड़े, दुखी मुल्‍क के लोगों के अभावों, कुंठाओं को बेचने और भुनाने का माध्‍यम भर नहीं है। (टी आर पी !) ये अपने भीतर इतनी ताकत समेटे है कि किसी इंसान का जमीन-आसमानी बदलाव कर सकता है, दिल में छेद कर सकता है, हिला सकता है, बना और मिटा सकता है। ये मन और सोच की दुनिया बदल सकता है।.....झांकिए

मसिजीवी said...

नहीं देखी... कोई नहीं अभी तक।

अगर कोई लड़की जो अभी लड़कपन में ही होती है अगर बोहेमियनपन की बीजों के साथ दिखती हे तो इसी सुखी जिंदगी की छवियों की मिसाइलों से मोहल्‍ले की (सुखी)औरतें हमला करती हैं... पूरा जमाना करता है...उनसे भी बच जाए कोई दढि़यल सा सपनों का बौद्धिक सिगरेट के धुँए के किले बनाते हुए इसी बोहेमियनपन पर फिदा होने की घोषणा करेगा... चंद साल के बाद ब्‍याहता या लिवइन में गिरफ्तार को पता लगेगा कि सब इन्हीं सपनों के किसी संस्‍करण की ओर धकेलने की साजिश ही थी। एक को अकेला छोड़ देने के लिए तैयार नहीं जमाना... इट इज टू इंर्पोटेंट ... होल वर्ल्‍ड इज़ एट स्‍टेक... एक भी औरत का बोहेमियन होना अफार्ड नहीं किया जा सकता।

सुशील कुमार छौक्कर said...

आपका लिखा पढकर तुरंत बुल्ले बाबा याद आए। और उनका लिखा कि "बुल्ला कि जाणा मैं कौन?................"

Manish Kumar said...

देखें आगे की कड़ी में आप किन इमेजेस से सामना कराती हैं. उत्सुकता रहेगी जानने की !

ओम आर्य said...

गुलजार साब की एक नज़्म है जो नज़्म से ज्यादा मुझे सच लगती है..आपने जरूर छाना होगा इसे...काफी लम्बा रहा है आपका संघर्ष..


मैं छाँव छाँव चला था अपना बदन बचाकर
कि रूह को इक खूबसूरत सा जिस्म दे दूँ ,
न कोई सलवट, न दाग कोई, न धूप झुलसे न चोट खाये
न जख्म छुए, न दर्द पहुँचे,
बस एक कोरी कँवारी सुबह का जिस्म पहना दूँ रूह को मैं;

मगर तपी जब दोपहर दर्दों की
दर्द की धूप से जो गुजरा तो रूह को छाँव मिल गयी है;


मगर तपी जब दोपहर दर्दों की
दर्द की धूप से जो गुजरा तो रूह को छाँव मिल गयी है;
अजीब है दर्द और तस्कीं का सांझा रिश्ता
मिलेगी छाँव तो बस कहीं धूप में मिलेगी ।

Atul CHATURVEDI said...

सबके साथ यही होता है कि वो होना चाहता है और हो कुछ और जाता है , वैसे ये कविता है या आत्मावलोकन या खुद को खोजने की ईमानदार कोशिश ...

शरद कोकास said...

ज़िन्दगी में जिस तरह साल आते हैं उसी तरह आते हैं विचार ।और ज्यों ज्यों बढ़ती है उम्र नज़रिया भी बदलता जाता है । पूर्वजों ने बहुत सारे मानदंड स्थापित किये हैं ,अब कोई लीक पर चलना ही न चाहे तो उसे अपना रास्ता खुद ही बनाना पड़ेगा और उस रास्ते को खतरनाक रास्ता कहने वालों से जवाब-तलब भी करना पड़ेगा । ऐसा पहली बार नहीं हुआ है और आखरी बार भी नहीं होगा । हर पीढ़ी में कोई न कोई अपना रास्ता खुद बनाता है ..और यह परम्परा चलती रहती है ..ज़िन्दगी अगर हमने चुनी है तो हमें उससे शिकायत भी नहीं होनी चाहिये ..।

अमित said...

कभी-कभी मन अकुलाता है
जग से मेरा क्या नाता है
जीवन-पथ चलते-चलते
राही ज्यौं उकता जाता है

कामना है कि आपकी कुछ इच्छायें इस वित्तीय वर्ष में और शेष अगले वर्ष पूरी हो जाँय। :)

प्रवीण पाण्डेय said...

जीवन विचित्र है | कभी भी आपको एक दिशा में बढ़ने नहीं देगा | जब आप एक दिशा में प्रसन्न हैं, मगन हैं, आपको आकर कुरेदेगा और दूसरी राह के बारे में उकसायेगा |
कौन कहता है की हम प्रकृति से खेल रहे हैं | प्रकृति तो दिन रात हमसे और हमारे विचारों से खेलती है |

Pawan Nishant said...

sawal karna jaroori hota hai aur kai baar dil nahi chahta ki kuchh sawalon ke jabab mil jayen. bahut khoobsoorat post hai. holi ki aapko shubhkamnayen

आनंद said...

वैसे जितने इमेज आपने बनाए हैं, उतने भी कहां मिलते हैं ....

- आनंद

स्वप्नदर्शी said...

Manisha
Life changes at unprecedented rate and takes you all the time in unimagined directions. Its not possible to make a plan for a lifetime in one go. The "Choice" or our ability to become something is determined by the factors that exist outside the wishes of individual domain. We only choose what is possible in one particular era. However, luckily there are plenty of choice even within this boundary for today's woman. Logic often leads to blind path, because it is based on the facts as we know them today, and knowledge keeps changing and makes logic obsolete. Follow your heart and intuitions ONLY those have ability to imagine "new".

sangeeta swarup said...

कितने लोग हैं जो रुक कर सोचते हैं की मैं कौन हूँ? और क्या चाहती हूँ? जब से होश सँभालते हैं उंगली पकड़ कर राह दिखा दी जाती है की इस पर चलना है....और बस उस राह पर आगे धकिया दिया जाता है.....पीछे मुद् कर ये भी नहीं सोचा जाता कि हम कौन सी राह आये हैं...

आप स्त्री मन कि अच्छी चित्रकार हैं....

विनीत कुमार said...

ab to baccha aanchal pakadne se bhi gayae,unki maayae truoser pahanne lagi hai,ab wo kaha pakde,aur haa wo pate ka khali hissa bhi kaha raha jaha mai bhi kabhi baaja bajakar kahta tha- abki baar itni jor se bajaunga ki nana ko sunai dega..

पुष्पा बजाज said...

मनीषा जी गज़ब का आत्म विश्लेषण किया है.

यही तो जीवन को समझने का सही प्रारंभ है !

भाग्यवान हैं आप !

आइये अपने आपका थोरा ऐसे भी करे !
http://thakurmere.blogspot.com/

अशोक कुमार पाण्डेय said...

सब ऐसा ही सोचा था…बस लाईब्रेरी में हिन्दी की किताबें भी चाहता था/हूं और वे हैं भी!

आशुतोष उपाध्याय said...

जिंदगी में सबकुछ इतना तयशुदा नहीं होता. यह अनिश्चितता ही इसे खूबसूरत बनाती है. इसलिए बुरे से बुरे वक़्त में भी अच्छे दिन पलटने की उम्मीद बनी रहती है अच्छे से अच्छे दिन भी डराते हैं, कहीं कुछ हाथ से निकल न जाय. आपने जीवन के जो बिम्ब उकेरे हैं, दरअसल उनको हासिल करना इतना रूमानी नहीं होता बल्कि उनको हासिल करने की प्रक्रिया में रूमानियत होती है. जीवन का संघर्ष इसे रूमानी बनता है, इसकी उपलब्धियां नहीं. उपलब्धिया तो अमूमन उबाऊ होती हैं.

संजय भास्कर said...

मनीषा जी,बहुत अच्छा लगा पढ़कर.सुबह-सुबह मन खुश हो गया.सो प्रतिक्रिया कविता जैसी हो गयी.

Sainny Ashesh said...

Tumhari khamoshi kitni sundar hai !
Ise sahejna.

http//snowaborno.blogspot.com aur Oshiya A New Woman blog tumhen yaad karte dikhayi de rahe hain.

Mera blog aaj Manisha Romshi ka birthday mana raha hai.

विजय गौड़ said...

ab wahi dauhrayu, yah theek nahi lag raha, par gujarish ki wakt nikal kar aage likhe tou feed chhod dijiye mere mail pr plz.