Sunday, 21 February 2010

एक बेचैन पत्‍नी का आत्‍म विलाप

जब से सुहासिनी आई है, आभा बेचैन रसोई से कमरे और कमरे से रसोई में फिरकी सी डोल रही है। रसोई में होती है तो भी कान लगाए रहती है कि आशु इसे गुपचुप क्‍या पढ़ा रहा है। कहीं मेरे बारे में तो बात नहीं कर रहे हैं। सब्‍जी काटते, दाल छौंकते, चावल बीनते उसके कान इधर ही जमे रहते हैं। पता नहीं, दोनों आपस में क्‍या गलचौर करते रहते हैं। बीथोवेन-सिथोवेन, राशिद खां, फासिद खां, अरे वही रोतड़ा, जो कभी तो ऐसे जोर-जोर गाने लगता है कि लगे दारू पीकर मतवाला हुआ है और कभी ऐसे रेंकता है, मानो बीवी दिनदहाड़े मर गई हो। नहीं, नहीं, बीवी नहीं, जैसे डायन महबूबा मरी हो। बीवी के मरने पर ये मुए हरामी मर्द आंसू थोड़े न बहाएंगे। तब तो उठाए तानपूरा और रेंकेगे। अच्‍छा हुआ, पिंड छूटा।

और ये सुहासिनी की बच्‍ची, कैसी बेशर्म औरत है। मेरे पति के सामने भकाभक सिगरेट फूंक रही है। कोई लिहाज नहीं है। ऐसे गला फाड़कर हंसती है कि पड़ोसियों की नींद खुल जाए। बात करते हुए क्‍या मुझे, क्‍या आशु को, पीठ पर धौल जमाती रहती है। चुड़ैल है। उसे तो बस मेरे पति को छूने का बहाना चाहिए। दिखाती तो ऐसे है कि कुछ फर्क नहीं पड़ता। लेकिन मैं जानती नहीं हूं क्‍या। खूब समझती हूं उसके जैसी डायनों को। अपना घर तो बसाया नहीं, दूसरों का घर उजाड़ने की फिराक में रहती है।

अड़तीस पार हो गई, पर अभी भी कैसी झाडू की सींक है। और मैं, उससे दो-तीन बरस छोटी ही होऊंगी पर फैलकर चबूतरा हो गई हूं। इसी आदमी की वजह से। क्‍या मेरा मन नहीं करता कि मैं भी 26 कमर वाली जींस पहनकर बाजार तक हो आऊं। कमसिन हसीनाएं कैसे कमर मटकाकर चलती हैं। बेहया लड़कियां। लगता है हिप पर एक बेलन लगाऊं कसकर। कभी इनसे कहूं भी कि मुझे जिम जाना है, स्लिम-ि‍ट्रम होना है तो कूदकर मेरे ऊपर चढ़ जाएंगे। क्‍या जरूरत है मेरी जान, तुम ऐसी गोल-मटोल ही अच्‍छी लगती हो मुझे। कितनी भरी-भरी, मोटी-ताजी। सूखड़ी हो जाओगी तो तुम्‍हें खाने में मजा नहीं आएगा। अभी लगता है जैसे गुलगुले गद्दे पर सवार हूं। मैं तो कैसे शर्म और खुशी से मर जाती हूं, जब ये मेरे मोटापे पर भी इतने कसीदे पढ़ने लगते हैं।

लेकिन फिर क्‍यों अभी इस पतरकी सींक के पीछे लगे हुए हैं। हिप डोलाती घूम रही है घर में इधर-उधर। रसोई में आकर झांककर चली जाती है। चुड़ैल कह रही है, आभा तुम भी यहां आकर बैठो हमारे साथ। क्‍या कर रही हो वहां। बेहया की जबान भी नहीं कटती बोलते हुए। मैं वहां आकर बैठ जाऊं तो खाना कौन बनाएगा उस हिरोइनी के लिए। वैसे भी दियासलाई जितनी तो है। क्‍या खाती होगी। उसकी तरह जिंदगी भर मर्दों को रिझाने के लिए कोई खाना-पीना थोड़े न छोड़ सकता है।

आशु भी कम नहीं है। उसे पता नहीं इस सड़े प्याज के छिल्के सी बदबूदार लड़की में क्या दिख गया है। सुहासिनी देखो ये वाला रिकॉर्ड, ये कलकत्ता कॉन्सर्ट की रिकॉर्डिंग है। तुम्हारा खजुराहो वाला प्रोग्राम कैसा रहा? हूं, बड़ी आई गाने वाली। ये कलछी फंसा दूंगी उस फटही बांस के गले में। फिर देखती हूं कैसे गाती है।

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23 comments:

डॉ .अनुराग said...

राजेंदर यादव द्वारा संपादित "कथा जगत की बागी मुस्लिम औरते "कभी पढियेगा .....खासतौर से तब्बसुम फातिमा की कहानी " जुर्म...."


पढ़कर लगेगा वक़्त बदला है .बस .ओर आस पास की इमारते ....बाकी सब कुछ वही है

अखिलेश शर्मा said...

बहुत सुंदर रचना है. उपमाओं का बेहद सुंदर प्रयोग. एक स्त्री की दूसरी से ईर्ष्या, द्वेष, होड़ का अद्भुत वर्णन. बधाई.

M VERMA said...

पढ़्ते हुए ऐसा लग रहा है जैसे मैं कोई रचना नहीं बल्कि किसी स्त्री का मन पढ़ रहा हूँ. कितनी बारीकी है आपकी इस रचना में.
बहुत सुन्दर

Snowa Borno said...

Someone ask me to see something on your page.

But when I tried, there was something else.

Can't you walk with the reader?

No? Aata nahin?

Koi baat nahin. Main hi daud loongi.... gaati huyi : "mujhe sath toh aane de... jis path pe chaaleee."

Jab thak jaogi, mere ghar aaraam karne aaogi. Pata tumhare pass hai. kisi ko bataogi to tumhari Ek khaas sigrette maari jayegi.

Come 4 rest 2 my 4rest.

Dam maaro dam!

मनीषा पांडे said...

Than what were you expecting my dear Snowa?

शायदा said...

आगे:.....

मनीषा पांडे said...

आगे और क्‍या। बस इतना ही है।

Sanjeet Tripathi said...

M verma jee ki bat se 100% sehmat hu sath hi shayda jee ka kahna bhi sahi hai ki iske aage aur hona chahiye.

mujhe to yeh laga ki aap is sare ghatnakram me maujud thi aur us stri ka man padhkar hi aapne likha....
abhi yahoo chat room me ek hindi blog premi se bat ho rahi thi to usne gyan dutt jee aur kinhi vartika ( not nanda) k sath ek manisha ( not u) ke blog ki tareef ki to use aapke blog ka link thamaa ke aa raha hu ki bandhu jara inhe padhiye...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बेचारी अबला नारी पर इत्ता जुलुम. दद्दा रे!

श्रुति अग्रवाल said...

अभी दुनिया के सबसे खूबसूरत (प्राकृतिक और मानसिक) देश न्यूजीलैंड में हूँ। आयुष के स्कूल में फ्री सर्विसेज के रूप में टीचिंग और पैरेंट्स हैल्प का काम करते हुए इस देश को समझने की कोशिश कर रही हूँ। सच कहूँ तो ये देश तुम्हारे-मेरे जैसी लड़कियों के लिए बना लगता है। य़हाँ समान अधिकार है साथ ही स्त्री को अपने बच्चों या फिर समाज के नाम पर शराबी-कबाबी पति के जुल्मों को सहने की जरूरत नहीं है। आप स्त्री हो या पुरूष यदि अकेले अपने छोटे नौनिहालों को संभाल रहे हो तो सरकार आपको आर्थिक सहायता देती है। जिससे आप अपने बच्चों का पूरा ख्याल रख सको। बहुत कुछ है बताने के लिए...लेकिन मेल पर वरना पोस्ट से बड़ा कमेंट हो जाएगा। मेल आईडी तुम्हारे ब्लॉग में भेज दिया है। मेल के इंतजार में।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

अब ये सुहासिनी और आशु जाके किचन में थोड़ा हेल्प कर देते तो बिचारी का गुस्सा थोड़ा कम तो हो जाता। क्या उनकी कलाकारी के लिये उसका किचेन में खटना ज़रूरी है? सारी प्रगतिशीलता दोस्त के लिये और पत्नी के लिये बस किचन!

मनीषा पांडे said...

ठीक कह रहे हैं अशोक। सहमत हूं। वैसे आशु ही क्‍या सब पति ऐसे होते हैं। दोस्‍त के लिए प्रगतिशीलता और पत्‍नी के लिए रसोई। लेकिन स्त्रियां भी कम नहीं होतीं। पति रसोई में चला आए तो लाड़ से उसे वापस भेज देती हैं। तुम जाओ, मैं हूं न करने के लिए। वैसे सुहासिनी रसोई में आ जाती तो भी आभा का गुस्‍सा, उसका डर और असुरक्षा कम नहीं होने वाले थे।

मनीषा पांडे said...

श्रुति, कहां है तेरा मेल आई डी। मुझे तो नहीं मिला। मेरा आईडी है -
manishafm@gmail.com

इस पर मेल करो।

ravi pandey said...

"बीवी के मरने पर ये मुए हरामी मर्द आंसू थोड़े न बहाएंगे। " bahut dard diya is ek line ne

mukti said...

सौ बातों की एक बात "सारी प्रगतिशीलता पतियों के लिये..."पत्नियों के लिये क्या?

Pankaj Upadhyay said...

क्या बात है?? पार्ट टू भी आना चाहिये.. बनता है..ऎसे थोडे न कोई सिगरेट वाली आकर आशु को ले जायेगी... :)

इज़ाडोरा की फ़ोटो ने दिल खुश कर दिया..और आपके ब्लैक एन्ड व्हाईट ब्लाग के क्या कहने!! फ़ीड, रीडर मे जा चुकी है..

विनीत कुमार said...

सुहासिनी ने आपकी मासूम जिंदगी में कुछ खलल डाला है क्या?

वीरेन्द्र जैन said...

दर असल इसमें एक वर्चस्ववादी पत्नी है जो जलने भुनने के लिये अभिशप्त है और एक प्रगतिशील आधुनिक जोड़ा है जो हमविचार है, और केवल दोस्त है। इन्हीं विसंगतियों पर भारत भूषण जी का एक गीत है-
ये असंगति ज़िंदगी के द्वार सौ सौ बार रोई
बाँह में है और कोई, चाह में है और कोई
जो समर्पण भी नहीं हैं वे समर्पण भी हुये हैं
देह सब जूठी पढी है, प्राण फिर भी अनछुये हैं
ये विवशता हर अधर ने कंठ में भर कर समोई
देह में है और कोई नेह में है और कोई

गुलाम अली भी एक गज़ल गाते हैं जिसके एक मिसरे में कहा गया है
मक़ीम कौन हुआ है मक़ाम किसका था

एक पूरी पीढी वन वे ट्रैफिक की शिकार है। एक पत्नी है जो स्वयं बदलना नहीं चाहती, हमकदम नहीं होना चाहती और पति को स्वतंत्र भी नहीं देख सकती क्योंकि उसे अपने अस्तित्व पर खतरा महसूस होता है। पर फिर भी किसी को खास तौर पर नारीवाद के झंडावरदारों को उस घुटते हुये गुलाम की कोई फिक्र नहीं है

अशोक कुमार पाण्डेय said...

वीरेन्द्र जी पत्नी पर यह आरो ठीक नहीं है। पति को उसमें गोल-मटोल बिस्तर और बढ़िया भोजन बनाने वाली चाहिये। वह बदल गयी तो आधुनिकता का पति का नक़ाब किचन के पसीने में बह जायेगा न। उसके होठो से सिगरेट लगी तो समाज में मुह क्या दिखायेगा?
आधुनिक महिला मित्र और आदर्श भारतीय नारी पत्नी एक शानदार कम्बिनेशन है सोसल स्टेटस बढ़ाने का। कभी पत्नी को दोस्त समझ के बतियाईये, घर के काम बांटिये, किताबें दीजिये और उसके सपनों का साझेदार बन कर तो देखे आशु…।

और मनीषा किसने कहा पत्नी के रोकने पर बाहर निकल आने oको?वैसे कितनी बातें मानते हैं पति उनकी कि यह बात माननी ज़रूरी है? उनको यह बखूबी समझाया जा सकता है कि किचन उनकी अकेली ज़िम्मेदारी नहीं है…बशर्ते यह अंदाज़ बस मुंह छूने भर का या किसी महिला मित्र को प्रभावित करने के लिये मौके ब मौके ओढ़ी गयी अदा न हो!

मनीषा पांडे said...

अशोक जी और वीरेंद्र जी,

आप दोनों की ही बातें सही हैं पर अधूरी। वो आधा सच हैं। किसी भी रिश्‍ते की व्‍याख्‍या इतनी एकरेखीय नहीं हो सकती। एक रिश्‍ते का सच दूसरे रिश्‍ते का भी सच हो, ये भी जरूरी नहीं है। हर रिश्‍ते अपना एक जटिल अतीत, वर्तमान, भविष्‍य, इतिहास और पेंच होते हैं। सबके व्‍यक्तित्‍व अलग हैं, मन, जीवन, सपने, चाहनाएं, परवरिश, विचार सबकुछ अलग हैं। ऐसे में कोई एक ऐसा नियम है ही नहीं, जिसे लागू करके रिश्‍तों को समझ लिया जाए और निष्‍कर्ष निकाल लिए जाएं। बहुत से पति ऐसे भी होते हैं, जैसाकि अशोक ने कहा कि दोस्‍त के लिए प्रगतिशीलता और पत्‍नी के लिए रसोई। लेकिन कई ऐसे भी हो सकते हैं, जो ऐसे न हों तब भी उनकी पत्नियों के साथ उनके रिश्‍ते सामान्‍य और सहज न हों। शायद उनमें प्रेम भी न हो। वैसे ये प्रेम भी वैसा ही उलझाऊ टर्म है, जिसका कोई एक अर्थ या व्‍याख्‍या मुमकिन नहीं है। सब अपने अपने तरीके से इसे भी समझते रहते हैं। शायद ज्‍यादा सीधी बात ये है कि हमारा समाज एक पिछड़ा और रुग्‍ण समाज है, इसलिए अलग अलग रूपों में यहां होने वाले सारे रिश्‍ते भी ऐसे ही होते हैं। ऐसा नहीं कि इसके लिए मर्द दोषी हैं या कि औरतें। कोई भी एक नहीं। पुरुष सामंती हैं और स्त्रियां भी सामंती ही हैं। पुरुष शोषण नहीं करते, रिश्‍तों के समीकरण ही ऐसे होते हैं कि उनमें थोड़ा कम या ज्‍यादा, क्रूर या मुलायम, दोनों ही एक दूसरे का शोषण कर रहे होते हैं। पुरुषों की सामाजिक स्थिति चूंकि ज्‍यादा सबल है, स्त्रियां उतनी आत्‍मनिर्भर नहीं होती, इसलिए कीमत उन्‍हें ज्‍यादा चुकानी होती है। पर ये व्‍यक्तियों के गलत होने के मसले से ज्‍यादा एक गलत समय और समाज में गलत जमीन पर गलत तरीके से बनने और टिकने वाले रिश्‍तों का मामला है।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

चलिये मनीषा यहां असहमति पर सहमत हो लेते हैं। आगे की बहस फिर कभी और फिर कहीं…

वीरेन्द्र जैन said...

मनीषाजी और अशोकजी
मैंने केवल इस दृष्य चित्र से कुछ वे निष्कर्ष लिये हैं जो आम तौर पर भुलाये जा रहे हैं। पूरे समाज के संश्लिष्ट रिश्तों के विस्तार में जाने का मेरा इरादा भी नहीं था। बस एक सलाह है कि अमृता प्रीतम की एक छोटी सी उपन्यासिका ''एस्कीमो स्माइल" ज़रूर पढें। नारीवाद के ऊपर मैंने भी काफी पढा और कुछ लिखा भी है किंतु नारीवाद की वकालत एक भिन्न विधा हो जाती है। उन वकीलों के लिये नारी केवल एक क्लाइंट होती है, जबकि हम रिश्तों की सम्पूर्णता में देख समझ कर ही न्याय कर सकते हैं...... चलिये फिर कभी।

sangeeta swarup said...

मनीषा जी,

आपके लिखे को पढने का अवसर पहली बार मिला....स्त्री मन को बखूबी शब्दों में उतार दिया है...ये अत्म्विलाप ना जाने कितनी आभाओं का है...पढ़ कर मन को कहीं संतुष्टि मिली..कम से कम किसी ने तो खुल कर विचार रखे...वर्ना मन के गर्त में ही दबे रह जाते हैं ..