Saturday, 27 March 2010

We all shit, we all pee but never talk about it

अगर मैं ठीक-ठीक याद कर पा रही हूं तो ये पिछली गर्मियों की किसी तपती दोपहरी वाले दिन घटी घटना है। मैं घर में अकेली थी कुछ-कुछ फुरसतिया मूड में कभी इधर, कभी उधर बैठकर टाइम पास करती। तभी दरवाजे की घंटी बजी।

दरवाजे पर दो महिलाएं खड़ी थीं। मेरे दरवाजा खोलते ही धुआं छोड़ने वाली 150 सीसी पल्‍सर की रफ्तार से शुरू हो गईं।

मैडम हम फलां कंपनी की तरफ से आए हैं, फलां फेयरनेस क्रीम और साबुन और शैंपू जाने क्‍या-क्‍या तो बेच रहे हैं। एक डेमो देना चाहते हैं।

मैंने उनकी बात खत्‍म होने से पहले ही अपने रूटीन बेहया लहजे में कहा, नहीं, नहीं, नहीं चाहिए। हम पहले से ही बहुत ज्‍यादा फेयर हैं। क्रीम लगाएंगे तो करीना कपूर छाती पीटकर रोएगी। उसके रूप के साथ हम अन्‍याय नहीं कर सकते।

मजाक नहीं, मैंने सचमुच ऐसा ही कहा। (मैं काफी बदजबान हूं और कब कहां क्‍या बोल दूं, मुझे खुद भी पता नहीं होता।)

दोनों थोड़ा इमबैरेस सी हुईं, लेकिन फिर मेरे चेहरे पर शरारती मुस्‍कान देखकर हंसने लगीं। अबकी मैंने फाइनल डिसीजन सुना दिया, ‘Look mam, I am not interested. ’

मुझे लगा कि अब वो लौट जाएंगी और किसी और का दरवाजा खटखटाकर सुंदर होने के नुस्‍खे बताएंगी। लेकिन वो कुछ मिनट और खड़ी रहीं। दोनों ने एक ही रंग और डिजाइन की साड़ी पहन रखी थी। दिखने में पहली ही नजर में कहीं से आकर्षक नहीं जान पड़ती थीं, लेकिन बरछियां बरसाती बदजात दोपहरी में दरवाजे-दरवाजे भटकना पड़े तो करीना कपूर भी दस दिन में कोयला कुमारी नजर आने लगे। वो मेरी तरह कूलर की हवा में बैठकर तरबूज का शरबत पीती होतीं तो निसंदेह उनकी त्‍वचा इतनी खुरदुरी नहीं लगती।

मैं दरवाजा बंद करके पीछा छुड़ाना चाहती थी, लेकिन वो मेरी रुखाई के बावजूद एकदम से पलटकर दोबारा कभी मेरा मुंह भी न देखने को उद्धत नहीं जान पड़ीं। उनकी आंखों ने कहा कि वो कुछ कहना चाहती हैं, लेकिन संकोच की कोई रस्‍सी तन रही है।

हम दोनों ही कुछ सेकेंड चुपचाप खड़े रहे।

फिर जैसे बड़ी मुश्किल से उनमें से एक हिम्‍मत जुटाकर बोली, मैम, हम आपका बाथरूम यूज कर सकते हैं।

मुझे उनकी बात समझने में कुछ सेकेंड लगे। फिर बोली, हां जरूर, शौक से। प्‍लीज, अंदर आ जाइए।

दोनों कमरे की ठंडी हवा में आकर सुस्‍ताने लगीं। एक-एक करके बाथरूम गईं, मुंह पर पानी के छींटे डाले। मैंने तरबूज का शरबत उन्‍हें भी ऑफर किया। दोनों चुपचाप बैठकर शरबत पीने लगीं और उस पूरे दौरान हुई बातचीत से उनके मुतल्लिक कुछ ऐसी जानकारियां हासिल हुईं।

वो किसी कंपनी में डेली वेजेज पर काम करती थीं, सुबह दस से शाम छह बजे तक और शाम को मिलने वाले पैसे इस बात पर निर्भर करते थे कि दिन भर उन्‍होंने कितने प्रोडक्‍ट बेचे थे। वो घर-घर जाकर अपने प्रोडक्‍ट दिखातीं (जैसे चश्‍मे बद्दूर में दीप्ति नवल चमको साबुन बेचती थी) और जिस घर जातीं, उनका नाम, मकान नंबर और साइन एक कागज पर दर्ज कर लेती थीं। उनमें से एक अपने एलआईसी एजेंट पति और दूसरी मां और विधवा बहन के साथ रहती थी। ये जानकारियां मैंने दनादन सवालों की बौछार करके जुटा ली थीं। लेकिन मैं mainly जो बात कहना चाहती हूं, उसका इन डीटेल्‍स से न ज्‍यादा, न कम लेना-देना है।

मैं घूम-फिरकर उस सवाल पर आ गई, जो मुझे इतनी देर से कोंच रहा था।

आप दिन भर इतनी गर्मी, धूप में घूमते-घूमते परेशान नहीं हो जातीं।

आदत हो गई है।

आपको प्‍यास लगे तो? ’

किसी के घर में पी लेते हैं।

और लू जाना हो तो? ’

क्‍या? ’

बाथरूम?’

बाथरूम जाना हो तो? आप लोगों को प्रॉब्‍लम नहीं होती। 8-10 घंटे आप बाहर घूमती हैं। बाथरूम लगे तो क्‍या करती हैं?’

मैंने देखा संकोच की एक लकीर उनके माथे पर घिर आई थी। जाहिर था कि जैसे उन्‍होंने मुझे लड़की, शायद थोड़ी बिंदास लड़की या जो कुछ भी समझकर मुझसे बाथरूम यूज करने की रिक्‍वेस्‍ट कर ली थी, ऐसा वो अमूमन नहीं करती होंगी, नहीं कर पाती होंगी। वैसे भी आप किसी अनजान के घर सामान बेचने जाकर उसके बाथरूम में नहीं घुस जाते। लेकिन बाथरूम Available न हो तो ऐसा तो नहीं कि सू-सू अपने आने का कार्यक्रम मुल्‍तवी कर देगी।

उन्‍होंने बताया कि उन्‍हें दिक्‍कत तो होती है। दिन भर वो कम से कम पानी पीती हैं। बहुत बार घंटों-घंटों इस प्राकृतिक जरूरत को दबाकर भी रखती हैं। मेरे काफी खोदने पर उन्‍होंने स्‍वीकारा कि ऐसा करने का उन्‍हें खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। पेट में दर्द से लेकर यूरिनरी इंफेक्‍शन तक वो झेल चुकी हैं।

पीरियड्स के समय भी आप ऐसे ही घूमती हैं?

वो और ज्‍यादा अपने संकोच में सिकुड़ गईं। मैं तो कोई पुरुष नहीं थी, लेकिन शायद लड़कियां भी लड़कियों से ऐसी बातें नहीं करतीं। इसलिए मैं उन्‍हें थोड़ी विचित्र जान पड़ी।

बोलीं, हां करना तो पड़ता है मैम। क्‍या करें, हमारी नौकरी ही ऐसी है। एक दिन न आएं तो उस दिन के पैसे नहीं मिलेंगे। और फिर घर भी तो चलाना है। आजकल महंगाई कितनी बढ़ गई है।

बातें जो न चाहें तो कभी खत्‍म न हों, को चाहकर हमने खत्‍म किया और वो चली गईं। वो चली गईं और मैं सोच रही थी। घड़ी की तरह शरीर में भी (खासकर औरतों के शरीर में) एक अलार्म होना चाहिए, जिसमें हर चीज का टाइम सेट कर दें। बाथरूम आने का भी टाइम सेट हो। सुबह दस से शाम छह बजे तक नहीं आएगी। जब घर में रहेंगे, तभी आएगी क्‍योंकि इस देश में पब्लिक टॉयलेट्स सच्‍ची मोहब्‍बत की तरह ढूंढे से नहीं मिलते। गलती से मिल भी जाएं तो पता चलता है कि सच्‍ची मोहब्‍बत नहीं, सड़क छाप, बदबू मारते गलीज बीमारियों के अड्डे हैं, जहां अव्‍वल तो लड़कियां घुसती नहीं और घुसती हैं तो ऐसा ही समझा जाता है कि छेड़े जाने की हरसत से आई हैं। और जो थोड़ी भलमनसाहत बाकी हो और उन्‍हें न भी छेड़ो तो आंखें फाड़-फाड़ देख तो लो ही सही।

तो ऐसे देश का सिस्‍टम तो बदलने से रहा, इसलिए अलार्म ही फिट हो सके तो कुछ बात बने। वरना हम ऐसी ही मुश्किलों से गुजरते रहने को अभिशप्‍त होंगे।

ऐसी मुश्किलों से मैं भी कम नहीं गुजरी हूं और बीमारियों को खुद आ बैल मुझे मार करने के लिए बुलाया है।

अपने जिए हुए अनुभव से मैं कह सकती हूं कि हिंदुस्‍तान जैसे मुल्‍क, जो हालांकि पूरा की पूरा ही बड़ा शौचालय है, लेकिन पब्लिक शौचालय का जहां कोई क्‍लीयर आइडिया न तो सरकार और न लोगों के दिमाग में है, में किसी लड़की के लिए ऐसा कोई काम, जिसमें उसे दिन भर सिर्फ घूमते रहना हो, करना किसी बड़ी बीमारी को मोहब्‍बत से फुसलाकर अपनी गोदी बिठाने से कम नहीं है।

मुंबई में मैंने कुछ समय फिल्‍म रिपोर्टिंग जैसे काम में हाथ आजमाया था, जिसके लिए मुझे घंटों-घंटों न घर, न ऑफिस, बल्कि बाहर इधर-उधर भटकना पड़ता था। सुबह नौ बजे मैं घर से निकलती, दो घंटे ऑटो, लोकल train और बस से सफर करके यारी रोड, पाली हिल, लोखंडवाला कॉम्‍प्‍लेक्‍स या महालक्ष्‍मी रेसकोर्स रोड के रेस्‍टरेंट में पहुंचती, फिर वहां से पृथ्‍वी थिएटर, पृथ्‍वी से जुहू तारा रोड, जुहू तारा से सात बंगला, सात बंगला से केम्‍स कॉर्नर, केम्‍स कॉर्नर से वॉर्डन रोड करते हुए मेरा शरीर रोड की तरह हो जाता था, जिस पर लगता हजारों गाडि़यां दौड़-दौड़कर रौंदे डाल रही हैं।

मुंबई जैसे विशालकाय महानगर में, जहां पांच सितारा होटलों के चमकीले टायॅलेटों, जिनकी फर्श भी हमारी रसोई की परात जितनी साफ रहती है, इतनी कि उस पर आटा सान लो, से लेकर बांद्रा की खाड़ी के बगल में बने आसमान के नीचे खुले प्राकृतिक शौचालयों तक सबकुछ मिल जाएगा, लेकिन पब्लिक टॉयलेट ढूंढना वहां भी धारावी में ब्रैड पिट को ढूंढने की तरह है।

सुबह नौ बजे से लेकर शाम 5-6 बजे तक भटकने के बाद मैं ऑफिस पहुंचती और सबसे पहले बाथरूम भागती थी। दिन भर काफी मिट्टी पलीद होती थी। बॉम्‍बे के बेहद उमस भरे दिलफरेब मौसम में बार-बार पानी या लेमन जूस पीते रहना मजबूरी थी, वरना डिहाइड्ेशन से ही मर जाती। इस तरह भटकते रहने का यह ताजातरीन अनुभव था। शुरू में काफी एक्‍साइटमेंट था। लेकिन इससे और क्‍या-क्‍या मुश्किलात जुड़े हैं या इसके और क्‍या-क्‍या नतीजे मुमकिन हैं, इस बारे में तब तक कोई अंदाजा ही नहीं था। नौ बजे घर से निकलने के बाद 1-2 बजते-बजते मैं काफी परेशान हो जाती थी। लेकिन मैंने हालांकि बड़े सामान्‍य, लेकिन कुछ विचित्र भी लगने वाले तरीकों से ऐसी हाजतों से निजात पाई है। ये बोलते हुए हंसी भी आती है, लेकिन फेयरनेस क्रीम बेचने वाली उन स्त्रियों ने तो मुझसे ही बाथरूम यूज करने की रिक्‍वेस्‍ट की थी, लेकिन मैं बड़े-बड़े सेलिब्रिटियों के घर ऐसी डिमांड रख देती थी।

एक दिन स्‍मृति ईरानी के घर पहुंची तो जोर की बाथरूम लगी थी। संकोच बहुत था, लेकिन कुछ जरूरतें ऐसी होती हैं कि दुनिया के हर संकोच से बड़ी हो जाती हैं। मैंने बड़ी बेशर्मी से पूछ लिया, May I use your washroom please.

उसने कहा, yes. Off course. ऑफ कोर्स मैंने खुद को कृतार्थ किया।

एक बार शेखर कपूर के घर, हालांकि वो उस समय घर में नहीं थे (ये बहुत दुख की बात है, क्‍यों‍कि शेखर कपूर पर मुझे क्रश है) मैंने सुचित्रा से ऐसी ही रिक्‍वेस्‍ट की और उन्‍होंने बड़ी खुशी से रिस्‍पॉन्‍ड किया। ऐसी रिक्‍वेस्‍ट मैंने सुप्रिया पाठक, किरण खेर, रेणुका शहाणे, सुरेखा सीकरी, नादिरा बब्‍बर वगैरह से भी की थी और शायद सबने इस रिक्‍वेस्‍ट की जेनुइननेस को समझा भी था। इंटरेस्टिंगली सभी स्त्रियों से ही ऐसी बात कहने का विश्‍वास होता था। बोस्‍कीयाना में बैठकर ढाई घंटे भी इंतजार करना पड़े तो भी मैं नेचर कॉल को चप्‍पल उतारकर दौड़ाती - 'भाग, अभी नहीं, बाद में आना।'

सिर्फ कुछ ही महीनों में सेहत की काफी बारह बज गई थी।

जारी……………


33 comments:

राम लाल said...

We don't, because that only is the difference between positive viz a viz negative thinking. And, one is free to think either way.

PD said...

हम्म.. समझ गए.. तुम्हारी बड़े बड़े फिल्मी सितारों से जान पहचान है.. (-:

बाकी अगले किस्त के पूरे होने के बाद लिखेंगे.. :)

M VERMA said...

बहुत स्वाभाविक बात को बहुत ही प्रभावी तरीके से आपने उठाया है.

कृष्ण मुरारी प्रसाद said...

सुबह एक अच्छी पोस्ट पढ़ने को.....मिला
.
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..
http://laddoospeaks.blogspot.com/2010/03/blog-post_27.html

Kulwant Happy said...

आपने शरबत पिलाया। मैं सलाम करता हूँ, लेकिन आपके सवाल बिल्कुल दुरुस्त न थे, क्योंकि पापी पेट के लिए जब कदम उठते हैं तो यह सवाल कोई मायने नहीं रखते कि दिन में मैं समय पर रोटी खा पाता हूँ या नहीं, बाथरूम के लिए मुझे कोस दूर एक खाली जगह जाना पड़ता है। आपके सवालों का जवाब आपके पास ही था, जरा सोचिए, इस शहर में आप जैसी कितनी हों गई, जो इनको कूलर की हवा और शरबत का आनंद प्रदान करती होंगी।

LIMTY KHARE लिमटी खरे said...

मनीषा जी आज आपका ब्‍लाग पढने का सौभाग्‍य मिला,
We all shit, we all pee but we never talk about it
पढने के बाद सचमुच आभास हुआ कि औरतों को कितनी परेशानी होती है नित्‍य कर्म में
काफी पहले एक आर्टिकल पढा था समाचार पतर का नाम याद नहीं जिसमें एक महिला को सफर में इसी तरह की होने वाली परेशानियों के बारे में बताया गया था
संभवत अस्‍सी के दशक के शुरूआत का मामला था यह
एक महिला सफर के दौरान लू के लिए कहां जाए पुरूष घूर रहे हैं, उसकी तस्‍वीर भी छपी थी जीन्‍स के पेंट में वह खडे होकर लू करने को मजबूर थी
बहरहाल इस तरह के जीवंत मुददे उठाने के लिए बधाई स्‍वीकार करें

लिमटी खरे

डॉ .अनुराग said...

जी हाँ ....कुछ मसलो को सभ्य समाज भी ज्यादा सीरियसली नहीं लेता ....पेशे के तौर पर मै अक्सर महिलायों को उनकी स्किन के लिए कहता हूँ ......ड्रिंक प्लेंटी ऑफ़ वाटर ....तो जवाब यही मिलता है ज्यादा पानी पीयेंगी तो बाथरूम भी ज्यादा आयेगा ...कामकाजी महिलायों की बहुत बड़ी परशानी है ...यहाँ तक की पूरी मसूरी की मॉल रोड पे दो बाथरूम है ..(....शुक्र है ..दो तो है ).एक बार कांडला साइक्लोन में .हम डॉक्टरो की टीम गयी थी रिस्क्यु ओपरेशन में .....उस दौरान एक गाडी से वापसी में मुझे याद है हम लोगो ने पहली बार किसी "पेड बाथरूम" का मुंह देखा था ....

डॉ .अनुराग said...

ओर एक बार दमन में ३१ दिसंबर की एक रात जब हमारी ट्रेन रात के २ बजे थी ओर साथ वाली लडकियों को बाथरूम जाना था .सारा शहर शराब के नशे में था .कुछ कुछ हम भी ....हमने दमन के थाने में जाकर ही बाथरूम इस्तेमाल करने की इज़ाज़त मांगी थी .....ओर जब लडकिय दस मिनट देरी से आई .....तब तक सारा नशा हिरन हो गया था

mukti said...

सच बोलती हो तो काट-काटकर नमक लगाने का काम करती हो तुम.
"-लेकिन बरछियां बरसाती बदजात दोपहरी में दरवाजे-दरवाजे भटकना पड़े तो करीना कपूर भी दस दिन में कोयला कुमारी नजर आने लगे। वो मेरी तरह कूलर की हवा में बैठकर तरबूज का शरबत पीती होतीं तो निसंदेह उनकी त्‍वचा इतनी खुरदुरी नहीं
-जहां अव्‍वल तो लड़कियां घुसती नहीं और घुसती हैं तो ऐसा ही समझा जाता है कि छेड़े जाने की हरसत से आई हैं।"

हम भी इस नेचुरल कॉल को टाल-टालकर ना जाने कितनी बार यू.टी.आई. से त्रस्त हुये हैं. हम जैसी बेशर्म लड़कियाँ तो किसी के घर में तो रिक्वेस्ट करके काम निपटा लेती हैं, लेकिन बाहर का काम हो तो आफ़त आ जाती है... ... सबको होती है ये प्रॉब्लेम, पर सभ्य समाज इस पर बात नहीं करता.

विनीत कुमार said...

मनीषा,वाकई बहुत सीरियस सवाल उठाया है आपने। आप कहती हैं लड़की होने की बात। मुझे लड़का होने पर भी.रेड एफएम का एड याद आ रहा है-कंटोल कल लोगे,करना पड़ता है। जहां-तहां इस खुशफहमी में धार बहाने की आदत नहीं कि इससे मिट्टी का कुछ न कुछ भला होगा। लेकिन सरकारी पैसे पर पलता हूं इसलिए देश के सारे सरकारी प्रतिष्ठान अपने से लगते हैं इसलिए कभी तो हील-हुज्जत तो कभी ठसक के साथ इसके वॉशरुम में घुस जाया करता हूं। हां एक आदत जरुर है कि पानी के गिलास के लिए एक रुपया देने में भले ही नानी याद आए लेकिन शुलभ शौचालय को एक रुपया देने में हिचक नहीं होती। फिर भी परेशानी तो झेलनी ही पड़ती है।..और पीडी,यार कभी तो सीरियस रहा करो,जैसे मैं हो जाया करता हूं।.

Dr. Smt. ajit gupta said...

पहली बार युवा मन की परते खुल रही हैं ब्‍लाग पर। नहीं तो सभी बुजुर्गवा संदेश देते दिखायी देते हैं। इस देश में सुलभ नामक सार्वजनिक शौचालय का चलन हुआ था लेकिन वो भी बदबू की भेंट चढ़ गए। इतना सटीक मुद्दा है और इतने अच्‍छे ढंग से उठाया है कि आनन्‍द आ गया। बधाई।

anitakumar said...

बढ़िया पोस्ट, अजित गुप्ता जी से सहमत्। अगर वी टी साइड की अंग्रेजों के जमाने की इमारतों में काम किया होता तो पता चलता कि एक एक कमरे के ऑफ़ि्सों में भी कोई वाशरुम नहीं होते और दो फ़्लोर चढ़ कर पब्लिक टॉयले्ट इस्तेमाल करना पड़ता है जिसे प्रिटिंग प्रेस के वर्कर भी यूस करते हैं। महिलाओं के लिए कोई अलग फ़ेसिलिटी नहीं और ऑफ़िस रोज आठ घंटे का।

राजकिशोर said...

well done. really it is more difficult to get rid, at the proper time, of the refuse of what one eats and drinks than have access to what one eats and drinks. for women both are hellish.

Sonal Rastogi said...

कितनी सहजता और इमानदारी से महिलाओं की समस्या सामने रख दी है सच है ना "जिसके पाँव न फटी बिबाई ,वो क्या जाने पीर पराई "
पहली बार पढ़ा आपको पर सच में आनंद आ गया

Manish Kumar said...

बहुत सही विषय चुना है आपने! और ये बात तो बहुत सटीक कही हैं आपने...

"हिंदुस्‍तान जैसे मुल्‍क, जो हालांकि पूरा की पूरा ही बड़ा शौचालय है, लेकिन पब्लिक शौचालय का जहां कोई क्‍लीयर आइडिया न तो सरकार और न लोगों के दिमाग में है, में किसी लड़की के लिए ऐसा कोई काम, जिसमें उसे दिन भर सिर्फ घूमते रहना हो, करना किसी बड़ी बीमारी को मोहब्‍बत से फुसलाकर अपनी गोदी बिठाने से कम नहीं है।"

जिसे ना भी घूमना पड़ता हो....मसलन सरकारी दफ़्तरों में, वहाँ भी हालात अच्छे नहीं हैं। लेडिज टॉयलट की समुचित व्यवस्था नही है। जेंट्स टायलट की सफाई ऐसी होती है कि वहाँ जाने से अच्छा कम पानी पीना ही इन्हें श्रेयस्कर लगता है। यही हालत ट्रेनों के आम डिब्बों और बसों में सफ़र करने के दौरान होती है।

मेरी पत्नी जो बैंक में कार्यरत हैं को ब्रांच में अपने वरीय अफसरों को दस महिने लगातार इस बात को समझाने में लगे कि बैंक के रिनावेशन में सबसे पहला कदम लेडीज टॉयलट होना चाहिए। आखिरकार उन्हें सफलता मिली पर उनके आने के पहले उनकी कई कनीय सहयोगी उन्हीं हालातों में सालों से ड्यूटी कर रही थीं और संकोचवश कुछ कह नहीं पाती थीं।

sangeeta swarup said...

सटीक मुद्दा और प्रभावशाली लेखन....

dimple said...

हम्म..मनीषा आपने बहुत कुछ कह दिया बाकी सब टिप्पणिया कह देंगी..ये सेल्ज़ गर्ल्स कई तो दीप्ती नवल की तरह कपडे धो के दिखा के ही सांस लेती है ये बेचारी तो फिर मान गयी उनके दिन भर मेहनत करने को सलाम.its a tough job और शेखर कपूर का क्रश..हाय !लो जलन का एक और कारण आप तो बड़े बड़े लोगो को जानती है.जल के ही मर जाना है हमने तो.

Sanjeet Tripathi said...

मुद्दा सटीक है और आपके लेखन की तो बात ही क्या।

यह समस्या सार्वभौमिक है, अकेले मुंबई की नहीं।
रायपुर जैसे अपेक्षाकृत छोटे शहर में भी।
दो महीने पहले ही इस मुद्दे पर ध्यान गया था तो अपने एक जूनियर को बोल कर इस पर एक रिपोर्ट तैयार करवाई थी, यह तो अच्छा है कि अब यहां की महापौर खुद ही एक महिला है। उम्मीद है यहां इस दिशा में कुछ काम होगा क्योंकि हाल ही में उन्होंने एक गार्डन को सिर्फ महिलाओं के लिए घोषित कर दिया है।

VICHAAR SHOONYA said...

आपकी यह पोस्ट पढ़ी फिर पिछली सारी पढ़ गया। आज मैं खाली था पर अब जी भर गया।
टिपण्णी का प्रसाद दिए जाता हूँ। आगे भी इसी बेबाकी से लिखती रहेंगी आश लिए जाता हूँ॥
(घबराएँ नहीं मै सीख रहा हूँ।)

अपूर्व said...

ऐसे विषयों पर बात करते हुए हम कितने सकुचाते है.इसी बात से स्पष्ट होता है कि शीर्षक चुनने के लिये भी अंग्रेजी की शरण मे जाना होता है..और विरोधाभास ऐसा कि शंकानिवृत्ति के कार्य्क्रम हम सार्वजनिक रूप से सम्पन्न करने मे सकुचाते नही मगर बातों मे यह वर्ज्य है..

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

और आपको बताऊँ, मध्यप्रदेश में छः-दस घंटों की बस की यात्रा में महिलाएं बेहत कष्टप्रद हालत में सिकुड़ी सी बैठी दिखती हैं. जिन बस अड्डों में गाडी रुकती है वहां बजबजाते हुए पेशाबघर होते हैं जहाँ पैर बचाते हुए चलना पड़ता था. अब तो कहीं कहीं सुलभ की व्यवस्था हो गई है. पहले तो मैं भी किसी झाड़ी या गुमठी की आड़ खोजकर निराश हो जाता था (क्योंकि मैं हिंदुस्तान को ओपन टॉयलेट नहीं समझता).मुझे लगता है की UTI के ज्यादातर केसेज़ के लिए यही समस्या जड़ में है. हमारे यहाँ पेशाब घर के लिए दो रूपये देने में लोग कतराते हैं जबकि यूरोपीय देशों में इसी काम में कम से कम तीस रूपये 'खर्च' हो जाएँ.
और उन मरीजों के बारे में क्या जो किन्हीं रोगों के कारण अपने वेग नहीं रोक पाते हों? उनकी तो पूरी आउटसाइड लाइफ ख़त्म हो जाती है.
एक सर्वव्याप्त लेकिन अचर्चित विषय पर बेहद उम्दा पोस्ट.
अगली का इंतज़ार है.

अजय कुमार झा said...

यदि ये कहूं कि आपकी लेखनी में धार है तो आप कहेंगी इसमें कौन सी नई बात है ....वो तो मुझे मालूम है ..आखिर बेदखल की डायरी है ...मगर यदि ये कहूं कि आप लिखने से पहले कलम को रोज सान चढा देती हैं तो ..उसके दांत पैने हो जाते हैं जी ..अब देखिए न ..और तो और हमारे फ़िल्म सीरियलों तक में कभी ..महिलाओं की इस दिक्कत को किसी भी नज़रिए से नहीं दिखाया गया ....आपने बेबाकी से डायरी ही उलट के रख दी ...वैसे पीडी के लिखने के बाद हम भी सोच रहे हैं ..हे प्रभु किसी दिन ये लडकी ..मायावती या सोनिया गांधी से भी न कह दे ...excuse me ..can i use your ......। आपकी पोस्टें सहेजी जा रही हैं ..एक और डायरी में
अजय कुमार झा

अमित अग्रवाल said...

आपकी लिखाई काफी अच्छी है. पढ़कर अच्छा लगा| कई जगह आपने यह मुद्दा उठाया है कि भारत में पब्लिक शौचालय नहीं हैं| आपसे पूरी तरह से सहमत हूँ तथा मानता हूँ कि ऐसा गलत है| एक वाकया याद आ गया तो सोचा कि आप लोगों के साथ साझा करूँ.
सितम्बर २००८ की बात है, मैं नियाग्रा प्रपात देखने टोरोंटो गया था| टोरोंटो में एक भारतीय बाजार है वही पर एक होटल में मैंने कुछ खाया| जब मैं वहां खा रहा था तभी मैंने देखा कि एक स्त्री होटल के अन्दर आई और उसने शौचालय के बारे में पूछा| होटल का नौकर (या मालिक जो भी था) ने साफ़ शब्दों में कह दिया कि "सॉरी माम,
टोइलेट इस ओनली फॉर कस्टमर्स"| मुझे ये सुनकर बहुत गुस्सा आया और मैंने तुरंत उस नौकर से कहा कि " आई ऍम यौर कस्टमर, सो प्लीस लेट थेम यूज द toilet"|
बाद में मैंने सोचा, कि इस इतने विकसित देश में भी क्या पब्लिक शौचालय नहीं थे ?? या फिर उस भारतीय बाजार का हाल भारत जैसा था?

Udan Tashtari said...

समस्या आपने सही उठाई है. कामकाजी महिलाओं को यह तकलीफ तो बहुत बड़ी है. अगली कड़ी का इन्तजार है.

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

अब तक अन्ग्रेजी बोली जा रही है, अब तक तो सान्ची का हैन्ग ओवर उतर जाना चाहिये था। :)

रही पोस्ट की बात तो हर बार की तरह एक जलता हुआ सवाल उठाया है तुमने.. कमाल है हमारे देश मे इतने राईट्स है, लेकिन ’राईट टु पी’ बहुत जरूरी है..

सच मे कितना आगे जाना है अभी भारत को.. ८ प्रतिशत की दर से हम आगे जा रहे है और कहने के लिये एक भी ढन्ग का टायलेट नही...

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

*पब्लिक टायलेट...

चंदन कुमार झा said...

भारत को अभी जरूरत है accelerated genetic evolution की ।

अगली कड़ी का इंतजार रहेगा ।

शोभना चौरे said...

मनीषा ,शाबासी ही दूँगी इतनी सच्ची बात को इतने प्रभावशाली ढंग से कहने के लिए |महिलाओ कि यह समस्या हर जगह व्याप्त है |मेरी देवरानी एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका है और उसे कई बार यूरिन इन्फेक्शन से गुजरना पड़ता है इस समस्या के चलते |अहमदाबाद जैसे शहर में अगर एस .टी।के बस स्टेंड पर चले जाये तो एक बार तो आपको उलटी ही आ जाएगी |और प्राइवेट ट्रेवल्स के जंहा ऑफिस है वंहा तो टायलेट ही नहीं है वहां कि महिलाओ के हाल भी आपकी पोस्ट के अंर्गत ही आते है |मजबूरी |अमिताभ बच्चन सी लिंक के उद्घाटन में चलेगये उस पर बहस ,साक्षात्कार पर समय पैसा बर्बाद किया जा सकता है |

सोनू उपाध्‍याय said...

60 sal pahle lohiya ne uttar pradesh aur bihar me.. mahilaon ke khule me shoch ki bat ko.. badi hi gambhirata ke sath sansad me nehru sarkar ke samne rakha tha.. ye sawal us samy se itana hi gambhir bana hua hai.. jitana ki aaj apke ghar aai hui ladkiyon ko dekhkar.. aur mubai me apne anubhavon se aap ko lag raha hai.. vaise sulbha ki kranti ki bhi tarif karni hogi.. Didi jarur padhian (Front Line - Augus or oct. ank)- khair.. mumbai me to is mar ko purush bhi line lagakar.jhelate dikhte hain.. par bechari striyan jyada jhelati hai.. vaise sub subah aap yadi mumbai me desh ke kisi bhi hisse se pahunch rahe hon to jo najara patriyon par dekhne ko milata hai vah vahn ki rajya ki rajniti ka ek samy bada mudda hua karata tha.. tab hamare bal sahb tahker ne apne pyare marathi bhaiyon ko slah dete hue kaha tha.. patriyon par baithane walon ko daggad se maro .. yahi isaka ilaj hai. khair didi.ye samasya purushon ko bhi mahangaron me toilet ki utani hi hai jitani striyon ki hai.. likn mahilain jyada pisa gai hain.. kai jagahon ke dhakke kahte hue.. itani jani hai.. ki shayd phone se bat karunga to ye rasrya samsya ho jayegi.. par filhal itana hi.. aapko jimmedari purn lekhan ke liye badhiyan..aur hain.. please frontline ka vah ank jarur padhiyega..

सोनू उपाध्‍याय said...

60 sal pahle lohiya ne uttar pradesh aur bihar me.. mahilaon ke khule me shoch ki bat ko.. badi hi gambhirata ke sath sansad me nehru sarkar ke samne rakha tha.. ye sawal us samy se itana hi gambhir bana hua hai.. jitana ki aaj apke ghar aai hui ladkiyon ko dekhkar.. aur mubai me apne anubhavon se aap ko lag raha hai.. vaise sulbha ki kranti ki bhi tarif karni hogi.. Didi jarur padhian (Front Line - Augus or oct. ank)- khair.. mumbai me to is mar ko purush bhi line lagakar.jhelate dikhte hain.. par bechari striyan jyada jhelati hai.. vaise sub subah aap yadi mumbai me desh ke kisi bhi hisse se pahunch rahe hon to jo najara patriyon par dekhne ko milata hai vah vahn ki rajya ki rajniti ka ek samy bada mudda hua karata tha.. tab hamare bal sahb tahker ne apne pyare marathi bhaiyon ko slah dete hue kaha tha.. patriyon par baithane walon ko daggad se maro .. yahi isaka ilaj hai. khair didi.ye samasya purushon ko bhi mahangaron me toilet ki utani hi hai jitani striyon ki hai.. likn mahilain jyada pisa gai hain.. kai jagahon ke dhakke kahte hue.. itani jani hai.. ki shayd phone se bat karunga to ye rasrya samsya ho jayegi.. par filhal itana hi.. aapko jimmedari purn lekhan ke liye badhiyan..aur hain.. please frontline ka vah ank jarur padhiyega..

डा० अमर कुमार said...

Hmm.. Let me INVENT a proper comment at this issue !

anjule shyam said...

नहीं मुंबई में तो हर जगह पब्लिक टॉयलेट्स है और कहीं नहीं तो कम से कम हर स्टेसन के बाहर तो जरुर हैं बने हैं...शुरू में मुझे भी नहीं पता था तो दिक्कत झेलनी पड़ती थी.मगर अब पता है किस स्टेसन के किस तरफ हैं ये ....P D भईया लग रहा है सही कह रहे हैं...जान पहचान बढियां है सितारों से आपकी....

sachhajhootha said...

One very true & awesome blog post.....