Saturday, 5 February 2011

Why loneliness matters so much?


जयपुर से लौटकर
पहला हिस्‍सा

अखबार के लिए लिखना कितना आसान है और अपने लिए लिखना कितना मुश्किल। जब पता हो कि आठ बजे पेज छूटना है तो उसके पहले ऑटोमैटिकली आइडियाज बरसने लगते हैं, एक से दूसरी पंक्ति जुड़ती जाती है और लो हो गई स्‍टोरी तैयार। लेकिन अपने दिल के लिए, अपनी खुशी और अपने एकांत के लिए लिखना उतना ही उलझाने वाला होता है। एकांत में इतनी सारी बातें, इतने विचार और स्‍मृतियां आपस में गुंथे होते हैं कि उनका सिरा खोजने में ही वक्‍त गुजर जाता है। ऐसे ही जयपुर से लौटकर कितना सारा वक्‍त गुजर चुका है, लेकिन ये वक्‍त जितना गुजरा है, उतना ही ठहर भी गया है। वक्‍त गुजरा है, क्‍योंकि हर दिन ऑफिस में नया एडिट पेज बनाया है, हर दिन नए आर्टिकल के साथ खुद को ज्‍यादा दुखी और उदास महसूस किया है, हर दिन घर के रोजमर्रा के काम कभी न रुकने और बदलने वाली गति से चलते रहे हैं। रोज दूधवाले ने नीचे से आवाज लगाई है, रोज किताबों पर धूल जमी है। रोज ऑफिस के गेट पर आई कार्ड चेक हुआ है और रोज कंप्‍यूटर शट डाउन करके मैं तकरीबन उन्‍हीं रास्‍तों से होती घर लौटी हूं। रोज टेलीविजन पर अमिताभ बच्‍चन ने पूछा है, जीने का लाइसेंस लिया क्‍या और रोज घर में आने वाले अखबार ने बताया है कि फलां कंपनी के 50 पर्सेंट ऑफ सेल में जिंदगी की सब खुशियों की चाभी है।

लेकिन वक्‍त ठहर भी गया है क्‍योंकि मन अभी भी डिग्‍गी पैलेस के फ्रंट लॉन, दरबार हॉल और मुगल टेंट में ही है। अभी भी ओरहान पामुक आउट ऑफ वेस्‍ट पर बात करते हुए राना दासगुप्‍ता के मूर्खतापूर्ण सवालों का थोड़ी तल्‍खी और बेचैनी से जवाब दे रहे हैं, इस अंदाज में कि दूसरे स्‍टुपिड सवाल का स्‍पेस ही न बचे। कोएत्‍जी पचास हजार लोगों की भीड़ में भी चुपचाप नजरें झुकाए हुए ऐसे हैं, मानो अपने किसी एकांत कमरे में जिंदगी और अवसाद की दूसरी दुनिया रच रहे हों। नाम ली अपने भोले और पवित्र सौंदर्य से बार-बार अपनी ओर खींच रहा है। एडम के चेहरे पर वही बच्‍चों जैसी प्‍यारी मुस्‍कुराहट है, जो दरबार हॉल में कविता पढ़ते वक्‍त उनकी आंखों में थी और उनकी कविता सुनते हुए जेएम कोएट्जी की आंखों में भी। (एडम के सेशन में कोएट्जी भी मौजूद थे।) इंपीरियल इंग्लिश पर हो रही बातचीत को सुनने के लिए नाटे कद का औसत सा दिखने वाला वह लेखक घास और मिट्टी की परवाह किए बगैर वहीं एक कोने में बैठ गया है, तकरीबन छह साल पहले तिब्‍बत और नेपाल होते हुए चीन से हिंदुस्‍तान तक के जिसके सफर को मैंने डिक्‍शनरी में एक-एक शब्‍द का अर्थ खोजते हुए फटी आंखों, कुलबुलाए दिमाग और अवसाद से भरी आत्‍मा के साथ पढ़ा था और चकित हुई थी। 25 तारीख की शाम, जब यह मेला खत्‍म होने को है, वह अपनी बुलंद आवाज में इक्‍वल म्‍यूजिक के हिस्‍से पढ़ रहा है, बातें कर रहा है। फ्रंट लॉन के एक कोने में किसी तरह जगह बनाकर खड़ी हुई मैं और शायद वहां मौजूद सभी लोग ये सोच रहे हैं कि इस सुटेबल बॉय का सेशन इतनी जल्‍दी खत्‍म हो गया। विक्रम सेठ इतना शानदार बोलते हैं कि उन्‍हें अभी और बोलते रहना चाहिए। वक्‍त सचमुच ठहर गया है। एडम जगायवस्‍की के साथ डांस करते हुए मैं भी ठहर गई हूं। मैं लौटकर अखबार के दफ्तर में नहीं जाना चाहती। 
फेस्टिवल से लौटकर होटल के कमरे के जिस एकांत में मैं गुजरे हुए दिन के साथ रातों को भी जीती हूं, ये एकांत युगों बाद नसीब हुआ है। यहां कोई नहीं। बस एक गुजर गया दिन है। बगल के कमरे में नॉर्वे से अपने ब्‍वॉय फ्रेंड के साथ आई एक लड़की है। 20 साल की उम्र में प्‍यार में है। अपने प्रेमी के साथ हिंदुस्‍तान घूमने आई है। कल सुबह अपनी बालकनी में धूप में बैठी मुराकामी की काफ्का ऑन द शोर पढ़ रही थी। किस देश से आती है ये लड़की ? कैसा होगा वह देश, वहां के लोग? कैसे ये लड़की पीठ पर एक बैग लटकाए अनंत महासागर और पहाड़ों की दूरी लांघती दूर देश के एक शहर को देखने आई है। वो हवामहल देखने, जो उसने तस्‍वीरों में देखा होगा। क्‍या वो जानती है कि इस शहर की लड़कियां और औरतें अपने कमरों से सटकर गुजरती सड़क को भी हवामहल की रंगीन शीशों वाली झिर्रियों से देखा करती थीं।  कि इस शहर की जाने कितनी  लड़कियां आज भी उन्‍हीं झिर्रियों से आसमान देखती हैं।

नॉर्वे की वो लड़की कैसे देखती है इस गुलाबी नगरी को? पता नहीं, लेकिन मैं उसे देखती हूं और इस शहर को।

मेरे कमरे में कोई नहीं है। इस कमरे में कोई और होना भी नहीं चाहिए। बस मैं और ये अकेलापन। मेरे सपने, मेरे ख्‍याल, मेरे दुख, मेरी किताबें। दिन भर की गुजरी हुई बातें। आउट ऑफ वेस्‍ट, इंपीरियल इंग्लिश। व्‍हाय बुक्‍स मैटर। 

व्‍हाय दिस लोनलीनेस मैटर्स सो मच।

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दूसरा हिस्‍सा

अवसाद का काला रंग और ओरहान पामुक  


20 comments:

Arvind Mishra said...

पढ़ा ,एज यूंजुअल पैनी धारदार लेखनी ...मगर वाक्यों का अलायिन्मेंट तो ठीक कर लें ,
या जिन्दगी की तरह ये भी बेतरतीब ही बनी रहे :) या फिर अकेलेपन और बेतरतीबपने के चोली -दामन साथ का फेविकोल जोड़ हो गया हो!हेल्प आउट योरसेल्फ यंग लेडी !

अजय कुमार झा said...

हां अपने दिल के लिए लिख पाना सहज कहां होता है ....मगर प्रवाह गजब होता है । बेदखल की डायरी हमेशा ही बांधे रखती है पाठक को ..और ...नहीं चलिए फ़िर कभी । जारी रखिए

Kishore Choudhary said...

बहुत सुंदर, जैसे कि अपने लिए लिखना !

richa said...

loved it...i am a big fan of urs now...lovely..

Sanjeet Tripathi said...

"अखबार के लिए लिखना कितना आसान है और अपने लिए लिखना कितना मुश्किल। जब पता हो कि आठ बजे पेज छूटना है तो उसके पहले ऑटोमैटिकली आइडियाज बरसने लगते हैं, एक से दूसरी पंक्ति जुड़ती जाती है और लो हो गई स्‍टोरी तैयार। लेकिन अपने दिल के लिए, अपनी खुशी और अपने एकांत के लिए लिखना उतना ही उलझाने वाला होता है।"

बतौर एक पत्रकार पूरे तौर पर इस बात से सहमत हूँ.

इतना अकेलापन कि बस आप ही आप हों, आपके साथ आपके दुःख, सपने, दफ्तर की बातें भी ना हो बहुत ही कम नसीब होता है, और जब नसीब होता है तो मन को एक अलग ही संतुष्टि मिलती है.
रश्क हो रहा है कि आप जयपुर बुक फेस्टिवल में हो आईं. उधर रविश जी ने भी अपने ब्लॉग पर इस बुक फेस्टिवल और जयपुर को अपने नज़रिए से लिखा है.

बड़े दिनों के बाद बेदखल की डायरी में आपका दखल अच्छा लगा. दूसरी किश्त के बाद फिर लम्बे समय के लिए गायब न हो जाईयेगा.

अमिताभ मीत said...

Hey ... You really write well !!

A beautiful post...

pratibha said...

चलो, जयपुर जाने के बहाने ही सही तुम लौटीं तो सही अपनी दुनिया में मनीषा. अखबार की दुनिया के पचड़ों से निकलकर एकांत तलाश पाना सचमुच एक महायुद्ध ही है. जिसे तुम जीत रही हो...बढिय़ा लिखा. और लिखो.

प्रवीण पाण्डेय said...

अपने बारे में लिखने के लिये अन्दर झाँकना पड़ता है, तब पता लगता है कि हम कितना कृत्रिम जीवन जी रहे हैं।

falsafa said...

10 महीने के बाद अपने ब्लाग में दखल देने के लिए शुक्रिया। हर बार की भांति इस बार भी आपने बेहतरीन लिखा है। किताबों से प्यार करना कोई आपसे सीखे।

Sonal Rastogi said...

थैंक्स ...वापस आने के लिए ... आपके लेखन का एक बड़ा हिस्सा अपने से जुदा लगता है ,बहुत इंतज़ार किया

वीरेन्द्र जैन said...

मेरी एक गज़लनुमा रचना की पंक्तियाँ हैं-

उसे सारा ज़माना चाहिए था

मगर घर तो बनाना चाहिए था

यही आवारगी की दास्ताँ हैं
कहीं कोई ठिकाना चाहिए था

mukti said...

तुम्हें पढ़ना एक ताजी हवा के झोंके सा लगता है. लिखती रहो. देखो कितने लोग़ इंतज़ार कर रहे थे तुम्हारा.

chalte-chalte said...

मनीषा, बहुत दिनों बाद बेदखल की डायरी पढ़कर बहुत अच्छा लगा। पता नहीं इतने दिन तक बिना लिखे कैसे रह पाती। कभी-कभी मुझे लगता है कि नहीं लिखना भी अपने-आपको सजा देने जैसा नहीं हैं........जबकि तुम इतना अच्छा लिखती हो.... अभी आउटलुक का महिला विशेषंाक देखा, तो बस तुम्हारी याद आ गई। पर... लेकिन.. परन्तु..... अब क्या कह सकते हैं ?????

पंकज शुक्ल। said...

हम जब अकेले होते हैं, तभी शायद विचारों की सबसे बड़ी भीड़ में होते हैं। आपको पढ़ते हुए हर्फ दर हर्फ, लफ्ज़ दर लफ्ज़ ये बात और पुख्ता होती जाती है। फिर कोई अकेला क्यूं है? एक जवाब लेख की आखिरी पंक्तियों में भी है, लेकिन सवाल फिर भी अकेला है।

सागर said...

काटो तो खून नहीं कसम से..

PRAVEEN said...

muktiji ne sahi kaha -taaji hawa ka jhoka..,dekha apka kitne log intzar kar rahe the..

anjule shyam said...

कैसे देखता है कोई ..क्यों कोई ..एक तस्वीर देख कर...पहाड़ों दर्रों और सागरों की छलांग लगा कर..लाँघ कर पहुचता है....किसी और देश को देखने..शानदार पोस्ट..

राजेंद्र तिवारी said...

वाकई, अपने तईं कुछ भी करना बहुत कठिन होता है...

Ekta Nahar said...
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Ekta Nahar said...
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