17-18 साल की उम्र में जब मैने पहली बार सिमोन द बोवुआर को पढ़ा और मातृत्व संबंधी उनके विचारों से दो-चार हुई, तो मेरी सोच में एक भयानक बवाल मचा। उम्र के उस पड़ाव पर पैदा हो रहे सहज बोध, सहज इच्छाओं और पढ़े हुए विचारों में ऐसी कुश्ती, धकमपेल मचती कि लगता दिमाग की नस ही फट जाएगी। जिंदगी के वो कुछ साल रिएक्शन के साल थे। वैसे भी हिंदी प्रदेश के लगभग निम्नवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने और प्रतापगढ़ी मर्दों की मर्दानगी का नमूना देखने के बाद सिमोन को पढ़कर कोई लड़की रिएक्शन में जीने लगे तो आश्चर्य नहीं। मर्दानगी भी ऐसी कि जो आए दिन बीवियों के शरीर पर जूते-चप्पल की शक्ल में नमूदार होती रहती, 50 पार आदमी की औरत भी 40 की उमर में नौवें या ग्यारहवें बच्चे की उम्मीद से होती। पता चलता, एक ही समय में माँ और बेटी, दोनों ही नाउम्मीद नहीं हैं। गांव में मुझे औरतों की जिंदगी बड़ी खौफनाक लगती थी। वैसा जीवन मेरे सिर आता तो मैं गांव के नजदीकी रेलवे स्टेशन से गुजरने वाली ऊंचाहार एक्सप्रेस के नीचे लेट जाना ज्यादा पसंद करती। मुझे लगता, ये औरतें क्यूं नहीं लेट जातीं। पति की लात और फूले हुए पेट से तो निजात मिलेगी।
जिंदगी के दरवाजे दस्तक देती जवानी और इंद्रिय-बोध के साथ लड़कों के मन और देह की दुनिया कैसे बदलती है, कुछ अंदाजा नहीं, लेकिन लड़कियों की दुनिया में बड़े अदेखे, रहस्यमय तूफान आते हैं। भीतर और बाहर की दुनिया प्रकाश की गति जैसी तेजी से बदलती है और कुछ समझ नहीं आता कि ये क्या हो रहा है। जिन लड़कों और चचेरे-ममेरे भाइयों के साथ हम अब तक जूतमपैजार में मुब्तिला रहते थे, अब अचानक उनसे भी कुछ शर्म-सी आने लगती है। भले अन्य बहनों के मुकाबले मुझमें लज्जाशीलता का यह पर्सन्टेज कुछ कम रहा था और तब भी मैं प्रेम-पत्र वाले खेलों के मुकाबले जूतमपैजार वाले खेल को लेकर ज्यादा एक्साइटेड रहती थी। बल्ला-गेंद या दूसरी किसी चीज को लेकर मैं भाई के साथ गुत्थम-गुत्था होती तो दादी अपनी चारपाई पर बैठे-बैठे ही बिफरतीं, ‘देख तनि इनकर दीदा, घोड़ी हस भइन अउर भाइयन से लिपटत-चिपटत रहत थिन, इनका तनकौ लाज नाही लागत।’
इस उम्र में पितृत्व की कोई भावना न जाने किसी लड़के के मन में कैसे आती है, आती भी है या नहीं, लेकिन किसी औरत का फूला हुआ पेट या नवजात शिशु को दूध पिलाती मां की छवियां दबे पांव लड़की की बदल रही दुनिया में अपनी जगह बना लेती हैं। कहीं, किसी कोने वो छवि छिपकर बैठी होती है और उम्र के तूफानों से अकेली जूझ रही लड़की के एकांत पाते ही पता नहीं कहां से धमक जाती है। हर सुबह लड़की हसरतों, सपनों, जिज्ञासाओं की ओस भीगी जमीन पर पांव रखती है। उमंगों की कोई डोर एक ओर खींचती है, तो अजाने भयों की डोर दूसरी ओर।
कई साल पहले, जब किसी रिश्तेदार की शादी में हमारा गांव जाना हुआ तो वहां बारात में आए लड़कों से आंखों-ही-आंखों में कुछ बातें और मुफ्त में मिले एकाध प्रणय-प्रस्ताव (शादी-ब्याह में ये बहुत ही आम बात है) के अलावा एक बात और हुई। एक लड़की, जो मुझसे कुछ बरस छोटी, लेकिन विवाहिता थी और पिता के घर का बासन-चूल्हा संभालते हुए पांच महीने बाद होने वाले अपने गौने का इंतजार कर रही थी, ने एक रात घर के पिछवाड़े छपड़े के नीचे एक ही चारपाई पर लेटे हुए मुझसे शादी के बाद के रहस्यों के बारे में कुछ सवाल किए। उसके हिसाब से मैं शहर की लड़की थी, और मोटी-मोटी किताबें पढ़ती थी। (दिन में मेरे हाथ में अन्ना कारेनिना का मोटा पहला भाग देखकर उसे मेरे विद्वान होने का यकीन हो चुका था।) तो जरूर इस जानिब मैं उसे कुछ भरोसे लायक जानकारी दे सकूंगी।
शहर की लड़की उसकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी, लेकिन उसकी बेचैनी भरी जिज्ञासाएं बड़ी वाजिब थीं। घर में बड़ी बहन की जचगी देखे छमाहा भी न गुजरा था। गांव में कुंवारी लड़कियों को आमतौर पर ऐसे हौलनाक मंजरों से दूर ही रखा जाता है, लेकिन चूंकि उसकी मांग भरी थी, और बरस-दो बरस बाद यह हादसा उसके साथ भी पेश आना था, सो उसे किसी बहाने तिवरी की दुल्हन के यहां नहीं भेजा गया। कलेजे को चीर देने वाली वो डरावनी चीखें उसने सुनी थीं और बड़ा डरती थी कि मरद ऐसा क्या कर देते हैं, कि औरत को इतने खून के आंसू रोने पड़ते हैं।
खैर, उसका ये भरोसा टूटा तो टूटा ही सही, लेकिन सुबह वाली किताब की कहानी सुनकर उसका मुंह फटा की फटा रह गया। पति को छोड़कर दूसरा आदमी कर ली, ट्रेन के नीचे कट गई। कैसी औरत थी ये अन्ना। ऐसा करेगी तो कटेगी ही। उसका आदमी कुछ बोला नहीं। हमारे यहां होती तो जलता कंडा खींचकर मारते। गड़ासी से चीर देते, इंडारा में डुबो देते।
सीलबंद ढक्कन वाले डिब्बे जैसी दुनिया में रहती थीं लडकियाँ। डिब्बे में कोई आता-जाता तो था नहीं। एक मुई चींटी तक तो आती नहीं। अपने दिल की कहें भी तो किससे। सो डिब्बाबंद मुल्क की बड़ी होती लड़कियां अपने अकेलेपन को अकेले में ही गुनती-बुनती, अकेले ही जूझती रहतीं सबकुछ से।
मैं भी इसी डिब्बाबंद मुल्क की एक लड़की थी। बड़ी चाशनी घुली थी, जिंदगी में जवानी की तरंगों के आने से। चाशनी में सिमोन मार्का नारीवाद का छौंका भी लग गया। सब गड्डम-गड्ड।
Sunday, 24 February 2008
डिब्बाबंद मुल्क, बड़ी होती लड़की और मातृत्व की उलझी छवियां -2
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बड़ी होती लड़कियां
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17 comments:
जारी रखें मनीषा
अच्छा और सधे शब्दों मे बेहतरीन लेखन।
अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी।
लड़की की कथा खूब कही। मुझे लगता रहा है कि मानव शरीर और दुनियादारी के मामले में शहरी लड़कियों की समझ गांव की लड़कियों से थोड़ी कम ही होती है। क्या यह गलत धारणा है?
acha likha aapne, shayad mai in muddo ko samajhne mein baudhik roop se thoda chota hu lekin phir bhi abhi tak jo bhi dekha yahi dekha ki har jimmmedari aurto par hi kyon, bachpan gaon main beeta aur gaon ki aurto ki dasha dekhkar sach mein aisa lagta tha ki woh log kabhi bhi dobara aurat banane ki nahi sochegi, shayad apne vichar theek se nahi rakh pa rha hu lekin aasha karta hu ki woh bhi seekh jauga. Rohit Tripathi
latest Post :Urgent vacancy for the post of Girl Friend…
रोहित जी, आपकी टिप्पणी के लिए शुक्रिया। लेकिन आपसे विनम्र निवेदन है कि कृपया अपनी लेटेस्ट पोस्ट का लिंक बार-बार मेरे ब्लॉग पर न लगाएं।
A flowing expression to your feelings & early life experiences.
wonderfully written.
Our early life creates the script that we live throughout. And sometimes its really curious--- how much it is open to the "Chance". Just a matter of an event or two & your whole life can change. Just like pip said in Great Expectations --- Even a moment, if it is there, and if it is not there, makes all the difference.
You are cordially invited to visit my blog & comment if you feel like (Because I am absolutely new in blogging & need some suggestions)-- http:\\thephilosophicalpoint.blogspot.com
मनीषा
बहुत सही जा रही हो । बहुत से सवाल चलते चलते खडे हो रहे हैं । और बहुत सहज भी हो । कल तुम्हारा पूरा ब्लॉग छाना । बहुत मज़ा आया ।
बढ़िया ! बाक़ी ये गड्डम-गड्ड वाली स्थिति शायद सभी लड़कियों के जीवन मे आती है ।
चंद्रभूषण जी की बात से थोड़ा-बहुत इत्तेफ़ाक़ मै भी रखती हूं कि गाँव की लड़कियाँ शहर वालियों से ज़्यादा और जल्दी समझदार हो जाती हैं
दोनों भाग पढ़े...एक अनछुए पर जरूरी विषय पर बहुत अच्छे तरीके से आपने अपनी बात कही है..
बहुत अच्छा लेख । किशोरावस्था में परिवार द्वारा इस उम्र के बदलावों को समझाने का यत्न और इसमें अच्छे लेखकों की पुस्तकें बहुत सहायता कर सकती है । यदि परिवार इस विषय को टैबू ना बनाये तो यह सब बड़े आराम से समझा व समाझाया जा सकता है ।
घुघूती बासूती
Theek hai manisha ji, kahe ko gussa ho rahi hai aap :-)
चंदू, मैं भी आपकी बात से कुछ इत्तेफाक रखती हूं कि गांव की लड़कियां दुनियादारी और ऐसे सभी मामलों में शहरी लड़कियों से बीस ही होती हैं, उन्नीस नहीं। उस दिन उस लड़की के साथ हुई बातचीत ने भी कुछ यही सिद्ध किया था। शहर की लड़की उसके ज्ञान के आगे बैल डंबो साबित हुई।
वैसे पिछले दस सालों मे जो परिवर्तन भारत मे आया है वह उससे ५० सालों मे नही आया था. आज का समय है... आज गाँव की लड़कियाँ आई.आई.टी मे पढ़कर विदेश मे नौकरी करती हैं और अपनी पसन्द से शादी करती हैं और लोग कुछ भी नही बोलते और कुछ ऐसे भी लोग हैं जो सामन्तवादी ब्राह्मण का ढ़ीँडोरा पीटते पीटते वही विम बार के हवाले अपनी जिन्दगी को कर जाते है. दुनियाँ मे इतने तरह के लोग और सबका अपना पसन्द.
kuch sawal poochna chahti hoon aapse.
kya aap feminist hain jo kafi log
kahlana pasand nahi karte?
kis tarah k feminism me believe karti hain?
India me womens movement ko kahan pati hain aap agar different feminism theories k perspective me analyse karen to?
i hope answers milenge mujhe.
namastay,
may manish choubey, gorakhpur say. kaya kahu aap nay bahut kuch wo likh dia joo log baat karnay say dartay hay...fir v avee bahut kuch haa bahut kuch bacha hay...........
आप इलाहाबाद से पढ़ी हैं , जान कर अच्छा लगा। मैंने 1989 में विश्वविद्यालय छोड़ा...आप कब थीं वहां....
राकेश
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