Monday, 18 February 2008

हम लड़कियां पतित होना चाहती हैं


एक पतनशील स्‍वीकारोक्ति

(सुजाता ने नोटपैड पर पतनशीलता पर कुछ विचार व्‍यक्‍त किए। मैं सच कहने से खुद को रोक नहीं पा रही हूं।)

अपने घर की बड़ी-बूढियों और पड़ोसिनों, मिश्रा आंटी, तिवारी आंटी और चौबे आंटी से अच्‍छी लड़की होने के लक्षणों और गुणों पर काफी भाषण सुना है। और-तो-और, हॉस्‍टल में भी लड़कियाँ अक्‍सर मुझमें एक अच्‍छी लड़की के गुणों का अभाव पाकर उंगली रखती रहती थीं।

अच्‍छी लड़की न होने के बहुत सारे कारण हो सकते थे।

दादी के पैमाने ज्‍यादा संकुचित थे, मां के उनसे थोड़ा उदार और हॉस्‍टल के सहेलियों के थोड़ा और उदार। लेकिन पतित सभी की नजरों में रही हूं। जैसेकि शीशे के सामने चार बार खड़ी हो गई, या कोई रोमांटिक गाना गुनगुनाया, थोड़ा ज्‍यादा नैन मटका लिए, चलते समय पैरों से ज्‍यादा तेज आवाज आई, भाइयों के सामने बिना दुपट्टा हंसी-ठट्ठा किया तो दादी को मेरे अच्‍छी लड़की न होने पर भविष्‍य में ससुराल में होने वाली समस्‍याओं की चिंता सताए जाती थी।

मां इतनी तल्‍ख तो नहीं थीं। उनके हिसाब से घर में चाहे जितना दांत दिखाओ, सड़क या गली से गुजरते हुए चेहरा एक्‍सप्रेशनलेस होना चाहिए। सामने वाले शुक्‍ला जी का लड़का छत पर खड़ा हो तो छत पर मत जाओ, घर में भले बिना दुपट्टा रहो पर छत पर बिना दुपट्टा अदाएं दिखाना पतित होने के लक्षण हैं। अड़ोसी-पड़ोसी लड़कों से ज्‍यादा लडि़याओ मत। पूरा दिन घर से बाहर रहकर घूमने को जी चाहे तो लक्षण चिंताजनक है। रात में घर न लौटकर दोस्‍त के घर रुक जाने या इलाहाबाद यूनिविर्सिटी के गर्ल्‍स हॉस्‍टल में किसी सहेली के कमरे में रात बिताने को जी चाहे तो मां की नींद हराम होने के दिन आ गए हैं, ऐसा समझ लेना चाहिए। जबकि पापा अपने कॉलेज के दिनों के किस्‍से इस उम्र में भी मजे लेकर सुनाते रहे थे कि कैसे घर में उनके पांव नहीं टिकते थे, कि साइकिल उठाए वो कभी भी दस दिनों के लिए घर से अचानक गायब हो सकते थे और इलाहाबाद से सौ किलोमीटर दूर तक किसी गांव में जिंदगी को एक्‍स्‍प्‍लोर करते 10-15 दिन बिता सकते थे।

हॉस्‍टल की लड़कियां ज्‍यादा खुली थीं। वहां मैं कह सकती थी कि 20 पार हूं, लड़कों से बात करने को जी चाहता है। आमिर खान बड़ा हैंडसम है, मुझे उससे प्‍यार जैसा कुछ हो गया है। इन बातों को लड़कियां पतित नहीं समझतीं। उनके भी दिलों का वही हाल था, इतना तो मुंह खोलने की आजादी भी थी। लेकिन वहां भी पतन के कुछ लक्षण प्रकट हुए। जैसेकि ये तू बैठती कैसे है, पैर फैलाकर आदमियों की तरह। मनीषा, बिहेव लाइक ए डीसेंट गर्ल। ये पेट के बल क्‍यूं सोती है, लड़कियों के सोने में भी एक अदा होनी चाहिए।

हॉस्‍टल में मेरी रूममेट और दूसरी लड़कियां दिन-रात मुझमें कुछ स्त्रियोचित गुणों के अभाव को लेकर बिफरती रहतीं और जेनुइनली चिंताग्रस्‍त होकर सिखाती रहतीं कि अगर मुझे एक अच्‍छी लड़की, फिर एक अच्‍छी प्रेमिका, अच्‍छी पत्‍नी और अच्‍छी मां होना है, तो उसके लिए अपने भीतर कौन-कौन से गुण विकसित करने की जरूरत है।

जो मिला, सबने अपने तरीके से अच्‍छी लड़की के गुणों के बारे में समझाया-सिखाया। और मैं जो हमेशा से अपने असली रूप में एक पतित लड़की रही हूं, उन गुणों को आत्‍मसात करने के लिए कुछ हाथ-पैर मारती रही, क्‍योंकि आखिरकार मुझे भी तो इसी दुनिया में रहना है और अंतत: मैं खुद को इग्‍नोर्ड और आइसोलेटेड नहीं फील करना चाहती।

इसलिए कहीं-न-कहीं अपने मन की बात, अपनी असली इच्‍छाएं कहने में डरती हूं, क्‍योंकि मुझे पता है कि वो इच्‍छाएं बड़ी पतनशील इच्‍छाएं हैं, और सारी प्रगतिशीलता और भाषणबाजी के बावजूद मुझे भी एक अच्‍छी लड़की के सर्टिफिकेट की बड़ी जरूरत है। हो सकता है, अपनी पतनशील इच्‍छाओं की स्‍वीकारोक्ति के बाद कोई लड़का, जो मुझसे प्रेम और शादी की कुछ योजनाएं बना रहा हो, अचानक अपने निर्णय से पीछे हट जाए। 'मैं तो कुछ और ही समझ रहा था, ये तो बड़ी पतनशील निकली।'

कोई मेरे दिल की पूछे तो मैं पतित होना चाहती हूं, भले पैरलली अच्‍छी लड़की होने के नाम से भावुक होकर आंसू चुहाती रहूं।

वैसे पतनशील होना ज्‍यादा आसान है और अच्‍छी लड़की बनने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। हो सकता है, मेरे जैसी और ढेरों लड़कियां हों, जो अपनी पतनशीलता को छिपाती फिरती हैं, अच्‍छी लड़की के सर्टिफिकेट की चिंता में। डर रही हूं, कि खुद ही ओखल में सिर दे दिया है, लेकिन अब दे दिया तो दे दिया। चार और साथिनें आगे बढ़कर अपनी पतनशील इच्‍छाएं व्‍यक्‍त करेंगी, तो दिल को कुछ सुकून मिलेगा। लगेगा, मैं ही नहीं हूं साइको, और भी हैं मेरे साथ।

17 comments:

बाल किशन said...

हम लड़के भी पतित होना चाहते है.
कैसा रहे अगर सब मिल कर एक साथ पतित हो और खूब पतित-पतित खेलें.
फ़िर ये लोग ( घर की बड़ी-बूढियों और पड़ोसिनों, मिश्रा आंटी, तिवारी आंटी और चौबे आंटी) कुछ कर भी नही सकेंगे.
सब पतित मिलकर एक पतित ब्लोगर्स संगठन बना लेंगे.
और भी बहुत से विचार है एक बार शुरूं करले तो सब सुलझ जायेगा.

कमल शर्मा said...

मेरे कई पहचान वाले कहते हैं तुम पत्रकारिता में जाकर पतित हो गए हो। मुझे नहीं पता कि उनकी इस बात में कितना दम है लेकिन बाल किशन जी से सहमत हूं कि पतित ब्‍लोगर्स संगठन बना ही लिया जाए। जय हो पतित देवी और देवों की। आओं मिलकर पतित देश बनाएं।

रवीन्द्र रंजन said...

Let's start...we r waiting to join.

Manish said...

बहुत अच्छा लिखा है आपने। मेरा तो यही मानना है समाज की नज़रों में अच्छे बनने से अच्छा तो यही है कि हम अपने स्वाभाविक रूप में रहेंचाहे वो लड़का हो या लड़की।
स्कूल और कॉलेज में इस मापदंड पर पतनशीलता का स्तर स्थापित करने वाले मेरे सहपाठी बहुतायत में थे. कोई लड़की चार लोगों से हँस बोल बतिया ले तो भाई लोग उन्हे 'करप्ट' करार देते थे जबकि असली खुंदक तो इस बात से रहती थी कि वो लड़की उनके चाहने पर भी उनकी ओर घास नहीं डाल रही होती।
मुझे नहीं पता की आज की पीढ़ी की सोच में बदलाव आया है नहीं। दोहरे मापदंडों में कुछ तो बदलाव आया होगा ऍसी उम्मीद है।

भुवनेश शर्मा said...

हम तो पहले से ही पतित हैं ऐसा समझे जाने के कई कारण हैं- कभी मंदिर नहीं जाते, किसी भी लड़की से बात करते हिचकिचाते नहीं, जो सही लगता है वही करते हैं चाहे बुजुर्गों के जूते खाने का डर हो।

मेरा मानना है कि शरीफ होने का सर्टिफिकेट लेना बहुत आसान है और ज्‍यादातर लोग ऐसा कर भी रहे हैं. पर अंदर से पतित होकर और बा‍हर से शरीफ दिखने पर भी उनका कमीनापन व्‍यक्तित्‍व से टपक ही जाता है. जिंदगी में जितना ज्‍यादा दोहरापन होगा उनता ही कमीनापन भी होगा.
हम शरीफ बनने की आकांक्षा तो नहीं रखते पर अंदर-बाहर के इस अंतर के कारण किसी अंतद्वंद में नहीं पड़ना चाहते.

संदीप पाण्डेय said...

ऊपर की टिप्पणियां पढ़ के लगा की जाने लोगों ने पतित होने का क्या अर्थ लगा लिया है. मुझे तो पतित होना महान होने से भी ज्यादा दुष्कर लगता है. समस्या यही है की हमने चीजों का वर्गीकरण कर दिया है. अगर बात पतित होने की है तो सब पतित होना चाहेंगे. फ़िर बात होगी कम और ज्यादा पतित की और धीरे -धीरे सारा कुछ वापस ढर्रे पर. इसलिए हे साथियों! अगर तुम्हे पतित ही होना था तो क्या मनीषा जी के इशारे के इंतजार में बैठे थे?????

Debashish said...

मुझे अच्छी बात यह लगी कि मर्दों ने केवल इस पतित होने की बात को सराहा बल्कि अपनी लिमिटेशंस और पतित न हो पाने की मजबूरियाँ भी जाहिर की। शायद अजीत ने ही कहीं टिप्पणी की थी कि ये पतित होने की इच्छा का ताल्लुक जेंडर से कम है, समाज से ज्यादा है।

mukul said...

पतित यानि कि Free Thinkers ! बड़ा महत्व है इसका | दर असल हर रचनाशील व्यक्ति को पतित कहा जाता रहा है | अब चाहे विज्ञान हो या कुछ और | सुझाव यह है कि दिमाग को ठोस कीजिये और सम्भव हो तो लोगो कि चुटकियों का आनंद लीजिये |
रीतेश मुकुल

हर्षवर्धन said...

धन्य हैं मनीषा की पतित होने की इच्छाएं। और, हॉस्टल में लड़कियों को मनीषा में अच्छी लड़की नहीं पतित लड़की दिखती थी इसका बड़ा अद्भुत चित्रण है। जबकि, हॉस्टल में पतितियाने की होड़ सी लगी रहती है।

Rohit Tripathi said...

bahut sundar likha bahut hi sundar, bahut se vichar aa rahe hai man mein aapki is post par comment karne ke liye lekin samay ke abhaw ke karan abhi nahi kar pauga. :-)

latest Post :Urgent vacancy for the post of Girl Friend…

Anonymous said...

namastay ,
sahi kaha man domanative society may ghar ,samaj,dhram,media,book,savee nay aadmee aur aurat,lakdee aur larka kay liay kapray, activities,work , khilona , kaam dhanda , kon subject kon padhay gaa , sab kuch fixed kar rakha hay.......fixed cheej say jara edhay udhar hua nahi kee aap buree lakdee aur hum jaysay log buray lakday ho jaatay hay.
kaya kahay aur v kuch likhna hay....likhunga aglee baar...per pressure dono aur hay..badlaoo kaa..

BACHPAN - Bringing back Childhood said...

राकेश भाई से बड़ी तारीफ सुनी, पढ़ भी लिया | ऑफिस की लड़कियों से कहा की पढ़ लेना लेकिन सही मायने में कमेन्ट जैसा कुछ लिखने की जहमत न कर सका | आज पुनः पढ़ा तो अपराधबोध सा भी लगता है क्योंकि आये दिन देखते हैं अपने ही आसपास ये बन्धनों का जाल और कुतरने की कोशिश भी नहीं करते हैं | देखते हैं रोजाना किसी को उलझते और किसी को उल्झाते हुए इन जालों मैं |

parvez said...

very lovely peice. It is interesting how 'character' is defined (irrespective of gender) in this matrix of society. And then it is pushed down the throat of a child from the moment he or she begins to utter the first sounds.

Ever realized why it is so important for the society to keep these so called 'moral values' intact? The day people will realize that these are useless and give them up, it will be the birth of a new system. The existing SYSTEM will no longer work. And who will be the loser then? ...NOT the COMMON MAN, but the people who HOLD THE POWER.
For, they'll have no more power to scare anyone, anymore.

brilliant piece.

Apologies for writing my comments in english, but i am faster at it so taking the liberty.
parvez

Sameer said...

Interesting to read the same.. although don't know why, I feel that I have seen the same writing somewhere. May be it was published from your side to somewhere.

But its good to read.. I have left writing in Hindi from long and today happy enough to see many such blogs through your links.

Nitish Kumar
http://nitishkumar.wordpress.com
http://indianidolv4.wordpress.com

bhoothnath(नहीं भाई राजीव थेपडा) said...

सच तो यह है कि समय के हिसाब से सभी को ही पतित हो जाना चाहिए.....पतित होना कोई ऐसा-वैसा काम नहीं है.....ये दुनिया को सही अर्थों में विकासमान बनाये रखने ही उपक्रम है...!!

Suman said...

nice

dipu singh said...

आप ने पतित शब्द का इस्तमाल एक जागरूक, आधुनिक लड़की को दिखने के लिए किया है.