Wednesday, 20 February 2008

पतनशील स्‍वीकारोक्ति क्‍या कोई भड़ासी भोंपू है


हिंदी में बहसें कैसे होती हैं। जाना होता है, भदोही, पहुंच जाते हैं भटिंडा। किसी ने एक बहस शुरू की और हिंदी में कोई बात कही। तो कोई और, जिसे टूटी-फूटी फ्रेंच आती हो, (ठीक से हिंदी भी नहीं आती) बीच में कूदकर फ्रेंच में उसका जवाब देने लगता है। फिर कोई और टपक पड़ता है और बंगाली में कुछ-कुछ विचार फेंकता चलता है। फिर कोई किनारे से गुजरता है, और कहता है कि फारसी में मनीषा ने जो बात शुरू की है, उसका हिब्रू में जवाब बहुत शानदार बन पड़ा है।

पतनशील स्‍वीकारोक्ति पढ़कर भड़ासी को लगता है कि उनके भड़ासी बैंड में एक और भोंपू शामिल हुआ, तो किसी को तुरत-फुरत में ये सफाई देने की जरूरत होती है, कि वो तो मुक्‍त ही पैदा हुई हैं, उनके घर की रसोई स्‍त्री-पुरुष समानता का प्रतीक है और वो पतित या पतनशील कतई नहीं हैं। जैसाकि पहले भी कहा गया कि कुछ लपुझन्‍नों की लार भी टपकने लगती है कि वाह, चलो अब कभी परंपरा, तो कभी प्रगतिशीलता के नाम पर लड़कियों को पटाने की जरूरत नहीं। ये पतिताएं तो खुद ही आकर गोदी में बैठने को तैयार हैं।

यह पतनशील स्‍वीकारोक्ति क्‍या कोई भड़ासी भोंपू है। कौन कह रहा है कि लड़कियां अपने दिल की भड़ास निकाल रही हैं। यह मुल्‍क, यह समाज तो स्त्रियों के प्रति अपने विचारों में आज भी मध्‍य युग के अंधेरों से थोड़ा ही बाहर आ पाया है और वो बदलते बाजार और अर्थव्‍यवस्‍था की बदौलत। नहीं, तो अपने दिलों में झांककर देख लीजिए। हमारे प्रगतिशील साथी बलात्‍कार पर अदम गोंडवी की एक बेहद दर्दनाक कविता पढ़ रहे हों तो लगता है कि उनका मुंह नोंच लो। 'बैंडिट क्‍वीन' जैसी फिल्‍म के सबसे तकलीफदेह हिस्‍सों पर हॉल में बैठे लोग सीटियां बजाते मन-ही-मन उस आनंद की कल्‍पना में मस्‍त हो रहे होते हैं, बगल में बैठा कोई शूरवीर आपको देखकर बाईं आंख भी दबा देता है।

कैसा है यह मुल्‍क। इस इतने पिछड़े और संकीर्ण समाज में बिना सिर-पैर के सिर्फ भड़ासी भोंपू बजाने का परिणाम जानते हैं आप। आपको जरूरत नहीं, जानने की। अर्जुन की तरह चिडि़या की आंख दिख रही है। पतनशीलता के बहाने अपनी थाली में परोसी जाने वाली रसमलाई।

मैं यह बात आज इस तरह कह पा रही हूं, क्‍योंकि मैंने कुछ सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक सहूलियतें हासिल कर ली हैं। लेकिन सुल्‍तानपुर के रामरतन चौबे की ब्‍याहता और प्राइमरी स्‍कूल टीचर की 16 साल की बेटी से मैं इस भड़ासी बैंड के कोरस में शामिल होने को नहीं कह सकती। उनसे कुछ कहूंगी भी तो यही कि खूब-खूब पढ़ो, अपने मन और बुद्धि का विस्‍तार करो, इस काबिल बनो कि अपने लिए चार कपड़े, किताबें और सिर पर छत के लिए किसी मर्द की मोहताज न होओ। छत पर बिना दुपट्टा जाने को न मिले - न सही, पैर फैलाकर बैठने को न मिले - न सही, तेज चलने से कोई रोके तो कोई बात नहीं। किताब तो पढ़ने को मिलती है न। किताब पढ़ो, और उन किताबों के रास्‍ते वहां तक पहुंचो, जब तुम्‍हारे दुपट्टा उतार देने पर भी कोई मुंह नहीं खोलगा, क्‍योंकि तुम्‍हारे व्‍यक्तित्‍व और बुद्धि की ऊंचाइयां उनके मुंह को चाक किए रहेंगी।

यशवंत जी, आपके सारे सुझाव एक गरीब, दुखी देश की दुखी लड़कियों के रसालत में पड़े जीवन को और भी रसातल में लेकर जाते हैं। मेरी पतनशील स्‍वीकारोक्तियों का सिर्फ और सिर्फ एक प्रतीकात्‍मक महत्‍व है। उसे उम्‍दा, उत्‍तम, अति उत्‍तम स्‍त्री विमर्श का ताज मत पहनाइए। ऐसे सुझाव देने से पहले ये तो सोचिए कि आप किस देश, किस समाज के हिस्‍से हैं। मुझ जैसी कुछ लड़कियां, जिन्‍होंने कुछ सहूलियतें पाई हैं, जब वो नारीवाद का झंडा हरहराती हैं, तो क्‍या उनका मकसद लड़कर सिर्फ अपनी आजादी का स्‍पेस हासिल कर लेना और वहां अपनी विजय-पताका गाड़ देना है। मैं तो आजाद हूं, देखो, ये मेरी आजाद टेरिटरी और ये रहा मेरा झंडा।

आपको लगता है कि स्‍त्री-मुक्ति इस समाज के बीच में उगा कोई टापू है, या नारियल का पेड़, जिस पर चढ़कर लड़कियां मुक्‍त हो जाएंगी और वहां से भोंपू बजाकर आपको मुंह बिराएंगी कि देखो, मुक्ति के इस पेड़ को देखो, जिसकी चोटी पर हम विराजे हैं, तो हमें आपकी अक्‍ल पर तरस आता है। तिनका-तिनका आजादी पाई किसी भी स्‍त्री का अगर स्‍त्री की वास्‍तविक मुक्ति के प्रति थोड़ा भी सरोकार है, तो ऐसा कोई बाजा बजाने के बजाय वो पढ़ेगी, और खूब-खूब पढ़ेगी, अपनी आजादी को पोज करने के बजाय बड़े फलक पर चीजों को समझने की कोशिश करेगी, वह वास्‍तवकि अर्थों में बौद्धिक और भावनात्‍मक रूप से एक मुक्ति और आत्‍मनिर्भरता हासिल करेगी।

ये सब कैसे होगा, इस पर और भी बहुत कुछ गुनना-बुनना होगा। लेकिन फिलहाल भडा़सी बैंड की सदस्‍यता से हम इनकार करते हैं। आप अपने कोरस में मस्‍त रहें।

14 comments:

अनिल रघुराज said...

तेज़ धार। खरी-खरी बात...

And you thought i am dead? said...

मस्त.

फ़्रेंच, फ़ारसी, हिब्रू - सबकी खबर ऐसा ही कोई ले सकता है जिसके पाँव खुद अपनी जमीन पहचानते हों.

प्रगतिशील गोले फ़ेंक कर सेटियाने की कला देखनी हो तो गंगा ढाबा पर बैठिये कभी.

अजित वडनेरकर said...

मनीषा, बहुत तपी तपाई बात कही। सीधे सीधे समझ आने वाली। बनी रहे साफगोई। सच तो यूं ही चमकेगा...

दिनेशराय द्विवेदी said...

शाबाश मनीषा। बढ़े चलो ऐसे ही।

Debashish said...

बेबाकी पसंद आई। बिल्कुल सहमत।

Suresh Chiplunkar said...

सन्तुलित शब्दों में गुस्सा… आपके लेखों पर ध्यान रखना होगा… नई बहस(?) की शुरुआत के लिये साधुवाद्… :) :)

चौपटस्वामी said...

"गुनी जनन के हृदय को बेधत है सो कौन ।
असमझवार सराहिबो, समझवार को मौन ॥"

शाबास!

यशवंत सिंह yashwant singh said...

मनीषा जी, आपके लिखे का एक एक कर जवाब दिया है, ये रहा....
http://bhadas.blogspot.com/2008/02/blog-post_8604.html

जय भड़ास, जय चोखेरबालियां
यशवंत

अनूप शुक्ल said...

बहुत अच्छा लगा यह पढ़कर उनसे कुछ कहूंगी भी तो यही कि खूब-खूब पढ़ो, अपने मन और बुद्धि का विस्‍तार करो, इस काबिल बनो कि अपने लिए चार कपड़े, किताबें और सिर पर छत के लिए किसी मर्द की मोहताज न होओ।

हर्षवर्धन said...

मनीषा,
जब तुमने पतित होने की बात कही थी तभी से मैं इसके सही संदर्भ खोजना चाह रहा था। वैसे ये साफ हो गया था लेकिन, इस पोस्ट में तुमने सलीके से साफ कर दिया है। और, सच्चाई यही है कि मानसिक, आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भरता के अलावा कोई और तरीका नहीं कहीं भी बराबरी या आगे निकलने का। कुल मिलाकर तुम्हारी उस पोस्ट के बाद सबने पतित लड़कियों के नाम पर चुहलबाजी शुरू कर दी थी। असली विषय तो कहीं गायब ही हो गया था।

pooja prasad said...

अभी कुछ देर पहले जब पढ़ना शुरु किया आपको तो रोके नहीं रुका गया। बेहतरीन और बेहतरीन। बस इससे इतर कोई शब्द नहीं। जो सलाहें आपने सुल्तानपुर की टीचर ki beti को दी वो किसी बड़ी बहन की अपनत्वपूर्ण सलाह से कम नहीं है।
महिला मुक्ति और महिला विमर्श को एकतरफा और वाहियात से अदांज में मुस्कुरा कर नजरें टेढ़ी करने वालों को आपने तमाचा दे मारा है। मेरी अभिलाषा है कि ऎसे पुरुष इसे जरुर पढ़ें। नियति कुछ ऎसा करे कि वे आपका यह लेख शब्द शब्द पढ़ें। आपने ये जवाब भड़ास को दिया है मगर मैं इसे पुरुषों के एक बड़े वर्ग को जवाब मान रही हूं, बशर्ते वे इसे देखे तो।

Prafull said...

This is a late entrant in the blogworld & still trying to mannage Hindi Fonts. Hence this comment in a different language. Anyway the point is:
Don't you feel that the Hindi world (So-Called)is obsessed with this Man-Woman thing?

parvez said...

patansheelta pe tumharey teeno lekh padey aur un par likhey gaye saarey comments bhi. Pehle ki saralta, doosrey ki analysis aur teesrey ki dhaar ne dil khush kar diya. bohut umda likha hai.

jaisey kisi aur ne bhi kaha hai, kaash ye har mard ko padaya ja sakta. par phir sochta hoon ke 'kaash' kyoon... padengey sabhi padengey... Quratt-ul-en haider ko bhi pada. padna pada! kab tak apni aankhen kaan band rakhengey? zaroor padengey. aur likho!

Agar 'Hindi world' aaj 'man-woman thing' se obsessed hai to wo apni khushi se nahi balki un logon ki wajah se jo aaj un sawaalon ko utha rahey hain, jo kisi aur samaj aur literature (matlab ANGREZI) mey kaafi pehle uth chukey hain. bhale hi ye sawal yahan der (matlab sadiyon der) se pohunchey... par pohunchey to. mubarak ho.
:) parvez

Sameer said...

Really interesting to read. I didn't come to read such material very often on net. Caliber to make it a full time... Appreciating

Nitish Kumar
http://nitishkumar.wordpress.com
http://indianidolv4.wordpress.com