Tuesday, 27 November 2007

सोचो, क्‍या कर रही हो तसलीमा

बारहवीं पास की ही थी, जब मैंने 'औरत के हक में' में पहली बार पढ़ी। लिटरली मेरी रातों की नींद हराम हो गई थी। फिर मैं ढूंढती रहती कि कहां तसलीमा का लिखा कुछ मिले और मैं उसे घोट जाऊं। फिर 'नष्‍ट लड़की नष्‍ट गद्य' पढ़ा। फिर लज्‍जा। फिर सारे कविता संग्रह ढूंढ-ढूंढकर, ट्यूशन के पैसे बचाकर खरीदे और रातों को जाग-जागकर पढ़े।

पिछड़े हिंदी प्रदेश के निम्‍न-मध्‍यवर्गीय परिवारों से आने वाली और एक खूंटे में बंधा, 'ये मत करो, वो मत करो' जैसे ढेर सारे नियमों वाला जीवन जीने वाली मुझ जैसी जाने कितनी लड़कियों की नींदें उस किताब ने कत्‍ल की होंगी।

औरत के हक से शुरू हुई यह यात्रा 'वे अंधेरे दिन' पर आकर खत्‍म हुई और इस बीच द्विखंडित से लेकर फ्रांसीसी प्रेमी तक तसलीमा का लिखा कुछ भी मेरे पढ़ने से छूटा नहीं। अब उनकी आत्‍मकथा का पांचवा भाग भी आ चुका है, और अभी कुछ दिन पहले एक दुकान में किताबें पलटते हुए वो किताब देखकर मैंने परे खिसका दी। कभी सुभीता हुआ तो पढ़ भी सकती हूं, लेकिन फिलहाल तसलीमा अब मेरी वरीयता सूची में नहीं हैं।

उस स्‍त्री के साहस, उसकी भावनाओं को सलाम करती हूं, और उनकी आत्‍मकथा के चारों भाग पढ़ने के बाद कोई भी उस साहस के आगे नतमस्‍तक होगा। लेकिन यहां मेरे सवाल कुछ और हैं। तसलीमा कोई बहुत महान लेखिका नहीं हैं, और न ही उनकी रचनाएं अपने समय और जीवन के सवालों, स्‍वप्‍नों की बहुत आंतरिक झलक देती हैं। 17-18 साल की उम्र में किसी लड़की को वो बातें इसलिए आकर्षित करती थीं, क्‍योंकि बहुत अपनी प्रतीत होती थीं। अपनी ही जिंदगी के दुख, अपने ही सवाल लगते थे, और उस साहस के प्रति के आकर्षण, जो हममें तो नहीं था, लेकिन दूर देश की किसी स्‍त्री ने दिखाया था।

लेकिन जब चिंताएं ज्‍यादा गहरी हों, अपने आसपास की दुनिया को समझने, सवालों का हल पाने की जिज्ञासा ज्‍यादा बड़ी हो जाए, तो उन सवालों के जवाब किशोरावस्‍था की उस प्रिय लेखिका के पास नहीं मिलते। उसकी किताबें दुनिया को ठीक-ठीक उस रूप में, जैसीकि वह है, समझने में कोई मदद नहीं करती।

आज से पचीस साल पहले जब तसलीमा ने लिखना शुरू किया था, तब से लेकर आज तक मुझे उनके लेखन में कोई उत्‍तरोत्‍तर गति नहीं नजर आती। हर अगली किताब पिछले की पुनरावृत्ति है। कई मसलों में तो वो पीछे जाती दिखती हैं, जैसेकि 'फ्रांसीसी प्रेमी' मुझे कई मामलों में काफी कमजोर और लचर उपन्‍यास लगा। चार कन्‍या कि चार लघु उपन्‍यासों से भी ज्‍यादा लचर।
ये सारी बातें तीसरी दुनिया के एक गरीब मुल्‍क की निम्‍न-मध्‍यवर्गीय मुस्लिम परिवार से आने वाली लड़की के जीवन, उसके रचना-कर्म और 'मैं सुखी नहीं हूं, तुम सुखी रहना मेरे देश' लिखने वाली उस स्‍त्री के दुखों को कम करके आंकना नहीं है।

लेकिन ये भी तो सवाल हैं कि कोई किन प्रेरणाओं, किन आंतरिक जरूरतों और सवालों के वशीभूत होकर लिख रहा है। लेखक होने का क्‍या अर्थ है, कोई क्‍यूं लिखता है। किसी को क्‍यूं लिखना चाहिए, क्‍यूं सिर्फ लिखना ही चाहिए। किसी लेखन का अर्थ और उपयोगिता क्‍या है। किसी एक बिंदु से शुरू हुआ यह सफर किन रास्‍तों, दर्रों से गुजरता आग बढ़ा जा रहा है।

आगे जारी.....

14 comments:

अनूप शुक्ल said...

परसाईजी ने एक लेख में कमलादास और अमृताप्रीतम की आत्मकथाओं का जिक्र करते हुये 'एक मादा दूसरी कुड़ी' शीर्षक लेख लिखा था। इसमें यह बताया था कि इन आत्मकथाओं में अपने समय और समाज के सवालों से जूझने की कोई बात तड़प नहीं दिखती है। कोई सामाजिक चिंतायें नहीं हैं। आपकी यह पोस्ट पढ़कर अनायास वह लेख याद आ गया। अगली पोस्ट का इंतजार है।

SHUAIB said...

bechari tasleema !

अनिल रघुराज said...

तस्लीमा को मैंने पढ़ा नहीं है। लज्जा खरीदकर रखी थी कि दो चार पन्ने पलटे पढ़ने की ललक नहीं पैदा हुई। अब आपकी पोस्ट पढ़ने के बाद ज़रूर पढ़ूंगा ताकि पता लग सके कि हमारे जैसे मुल्क की लड़की का ग्रोथ पैटर्न क्या रहता है, किन सवालों से वह रू-ब-रू होती है। वैसे मुझे लगता है कि मनीषा जी, आपको अपनी पूरी यात्रा कलमबद्ध करनी चाहिए। हड़बड़ी में नहीं, पूरे इतमिनान से।

अभय तिवारी said...

चलो इसी बहाने तस्लीमा के लिखे हुए की चर्चा हो रही है.. ज़्यादातर की तरह मैंने भी उनका नहीं पढ़ा है.. अच्छा लिख रही हो..

आस्तीन का अजगर said...

तस्लीमा जैसी भी हो, तुम जो लिख रही हो, वह अच्छा है, पठनीय भी. अपने लिखे से ज्यादा तस्लीमा खुद इस वक्त, समाज, सियासत का बड़ा सवाल है. वह नहीं बनती, तो कोई और बनता. तुम एक ख़बरनवीस हो और असली ख़बरनवीस वे होते हैं, जो खुद कितने भी मुश्किल हो (आखिर यह एक मुश्किल रास्ता है जो तुमने चुना है) पर मुश्किल सवाल पूछने से नहीं चूकते. सवाल पूछना जिंदा होने की निशानी है. लिखती रहो.

mukul said...

तस्लीमा एक शोर हैं, वो दबी हुई आवाज़ का स्वर हैं | आत्म मंथन अथवा मंथन तभी हो सकता है जब शब्द हो |

गौरव सोलंकी said...

तस्लीमा कोई महान साहित्यकार नहीं हैं। मैं उनकी इज़्ज़त करता हूँ क्योंकि वो हिम्मती हैं, सच लिख सकती हैं।
हो सकता है कि आपके लिए जो प्रश्न आज महत्त्वपूर्ण हैं, तस्लीमा के लिखे हुए का उससे कोई सरोकार नहीं हो। लेकिन वे दिन याद कीजिए, जब आपकी रातों की नींद हराम हो गई थी। चाहे उन्होंने अपने साहित्य में प्रगति नहीं की, लेकिन यदि वे आज भी एक किशोरी के प्रश्नों को स्वर दे सकें तो तस्लीमा वाकई बहुत बड़ी लेखिका हैं...
और वे खुद भी लिखती हैं कि मैं बस घटनाएँ लिखती हूँ, बहुत अच्छा साहित्य नहीं।

हाँ मनीषा जी, बहुत दिन से आपकी कविताएँ नहीं पढ़ीं।
'प्यार में डूबी हुई लड़कियाँ' जैसा कुछ फिर से पढ़वा दीजिए।

Anonymous said...

aap shayad wahi manisha ji hain na jo webdunia mein bhi likhti hain.

मनीषा पांडेय said...

जी, मैं वही मनीषा हूं। वेबदुनिया में नौकरी करती हूं। लेकिन आप कौन हैं और आपके अनॉनिमस होने की वजह।

bhaskar said...

Aurat ke Haq me wakai bahut shandar kitab hai...lekhakiy kala ki drushti se nahi apitu kathy aur prashnvachak chihno ki vajah se...lajja bhi sawal uthati hai...ham magar fas jate hai sawalo ka uttar dene ki bajay is bahas me ki sawal aise kyu poochha vaise kyu nahi yaa bhasha aisi kyu hai vaisi kyu nahi..

kahana hai kuch aur said...

baaba re kya lkhto ho
himaat chahiye sach kahne ki
himmat se sach kaho to bura bhi mante hai na log
khoob jiyo khoob likho
likho unke bare me jo nahi likh pate apne bare me

indianrj said...

सुख पाने कि चाहत और इंतज़ार में ही. सुख है.

indianrj said...

सुख पाने कि चाहत और इंतज़ार में ही. सुख है.

विजय गौड़ said...

yahan bhi kuchh aage jaari rahne wala chhuta hua hai. aaj itminan se isi blog ko padhne baitha hu, anytha na lijiyega yadi tipaniyan apne ko dauhrati hui lage. achchha blog lag raha hai. kasi hui bhasha aur jeevan ko dekhne ke ek khas andaj se bhari post bha rahi hain, so.